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डॉ. मनोज रस्तोगी

मुरादाबाद

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दूध

Posted On: 24 Jan, 2011  
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जनरल डब्बा मस्ती मालगाड़ी में

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गरीबी – बेरोजगार – चमचा

Posted On: 16 Jan, 2011  
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जनरल डब्बा मस्ती मालगाड़ी में

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 आज के  समाज की  सबसे  ज्वलंत  समस्या  उठाने  के  लिये  धन्यवाद  आपको  -- आज  माँ  बाप  व्यस्त  है  और  बच्चे  आया  और  नौकर  के  बल  पर  पल  रहे  है  क्यों की  संयुक्त  परिवार  खतम  हो  गये  है  लगभग कामकाजी  माँ बाप  भी  अपनी  स्वतंत्रता  चाहते  है  घर  पर  बुजुर्ग  पुराने  आउट डेटेड  समान  की  भांति  या  घर  के  पिछले  हिस्से  में  या  अलग  एकाकी  दूसरे  शहर  में  फिर  बच्चे  कैसे  सीखें  सम्मान  और  एक  दूसरे  से  मिलबांट  कर  रहना  संस्कार  यह  तो  बड़ों  से  मिलता  है  उनका  लिहाज़  ही  अनुशासन  सिखाता  है  --  अगर  आज लोग  संयुक्त  परिवार  और  बुजुर्गो  का  महत्व  समझ  ले  तब  शायेद  काफी  हद  तक  समाधान  हो  जाये  वरना  नई  पीढ़ी  निरंकुश  होती  जायेगी  और  ओल्ड होम  बढते  जायेंगे  ----

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दरअसल, जीवन ऐसा नहीं है जैसा हमने समझ रखा है , ठीक वैसे ही हमारी जीवन शैली वह नहीं है जिसे हमने आज के परिवेश में अंगीकार कर लिया है। यही विरोधाभाष, तनाव उत्‍पन्‍न करता है। यह खींचता है एक तल से दूसरे तल की ओर। हम सुगमता जहां पाते हैं उस तल पर चले जाते हैं। भौतिक आकर्षण से हमने जो आचरण आज हम कर रहे हैं, वह हमारे स्‍वभाव के प्रतिकूल है। इसलिए यह सारी समस्‍याएं जिसका आप जिक्र कर रहे हैं उत्‍पन्‍न हो रहे हैं। दूसरी बात, संवाद की कमी। आज परिवार से बुजुर्ग खो सा गया है , अस्‍सी प्रतिशत बच्‍चे बिना किसी बुजुर्ग के साए में पल रहे हैं, माता पिता व्‍यस्‍त हैं, उनमें एकाकी पन है, वह अपनी विरासत को नहीं जातने हैं, इसलिए जब वो ऐसा कुछ आचरण करते हैं तो हम गाली देते हैं, यह एक तरह से आत्‍महीनता को दर्शाता है। हमने ऐसा बीज ही बोया है तो फल वैसा ही मिलेगा। आपने इस विषय को उठाया, जिसपर पूरे देश को चिंता की जरूरत है, आपको धन्‍यवाद देता हँ।

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सही पहचाना अपने डॉ साहब. वैसे ये तो सर्व विदित है की ये श्रीमान कृष्णं किसी समय एक कर्मठ कांग्रीस्य हुआ करते थे राहजनी से लेकर चरस अफीम की तस्करी इनके पुराने क्रिया कलाप रहे हैं. श्रीमान जी के दिल की तमन्ना MLA बनकर जनता की सेवा करना थी पर कांग्रेस तो क्या किसी भी पार्टी से टिकेट नही मिला. दिमाग में कीड़ा पुराना है कुलबुलाना तो था ही नतीजा आज आप देख ही रहे है. कभी केवल ४ मठ हुआ करते थे परन्तु १० - १२ मठाधीस तो इसी महोत्सव में सिरकत करते है अब कैसी वो मठ है और कैसे मठाधीस इश्वर ही जाने . वैसे जहा तक है हमारे देश में लगभग ६ लाख ग्राम है और ४८ लाख क करीब साधू संत. औसतन ८ साधू एक ग्राम पर आते है. अब अगर ८ साधू अपने मूल कर्तव्य समाज सुधर पर लग जाये तो हर ग्राम एक आदर्श ग्राम में बदल जाये पर वास्तव में तो ये साधू नामक जंतु हरिद्वार और ऋषिकेश में फ्री की खाते हैं और मौज उड़ाते हैं

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आजकल शादीय़ो में दिखावा बहुत  हो रहा है लोग़ दहेज लेकर शादी कर रहे हैं जिसको भी अपनी शान  दिखानी है अपने बल पर दिखाना चाहिए न कि लड़की वालों से पैसे लेकर - और ऐसा करना चाहिए कि शादी में  किसी भी प्रकार का दुसरों को दुःख न हो जिसको भी दिखावा करना है अपने बल पर घर पर करना चाहीए और  शादी मे तो शराब एकदम न तो पीना चाहिए न पिलाना चाहिए न तो पीने देना चाहीए बहुत से लोगो को देखा हुँ घर पर खाने के लिए ठीक से नही मिलता है लेकिन शादी में खाने के लिए कई तरह के नाटक करते हैं और  बाराती होने का भी मतलब य़ह नही होता है। कि दुसरे के बहु बेंटीय़ों के साथ गंदी हरकत करें और दुसरों को भी करने से रोकना चाहीए। दहेज तो। न लेना चाहीए न देना चाहीए दहेज को समाज में बुराई के तरह देखना  चाहीए मेरे पिताजी ने हम पाँच भाईयों की शादी किए परंतु एक भी शादी मे एक भी पैसा नहीं लिए दहेज नही लेकर समाज मे एक उदाहरण  बनना चाहीए

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के द्वारा: डॉ. मनोज रस्तोगी डॉ. मनोज रस्तोगी

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के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

आदरणीय श्री रस्तोगी जी, सादर अभिवादन दरअसल कल्कि महोत्सव कलयुग में किया जाने वाला ऐसा महोत्सव बनकर उभर रहा है जो भगवन कल्कि को अवतार ग्रहण करने की प्रेरणा दे रहा है, इसलिए इसे जो भी कहिये गलत नहीं होगा | यह अजब संयोग है की कुछ हीं दिनों पूर्व मै विष्णु पुराण में कलयुग के वर्णन वाला भाग पढ़ रहा था | वैसे तो कलयुग के बारे में अधिकांश भारतीय ग्रंथों में कुछ न कुछ जरूर लिखा गया है और धीरे-धीरे उन महान ऋषियों की लिखी हुई सारी बातें सच साबित हो रही है | मसलन, पाखंडी लोग सन्यासी अथवा विद्वान् का वेश धारण कर सम्मानित हो रहे हैं | प्रजा कर के माध्यम से प्रजा का धन हड़प रही है | धर्मात्मा पुरुषों के द्वारा शुरू किये गए कार्य अपूर्ण रह जाते हैं इत्यादि इत्यादि |......... गौरतलब बात ये है इन बातों (अश्लीलता एवं भ्रष्टाचार) को अपने अपने जीने का ढंग कह कर महिमामंडित किया जाता है | मेरा कहना है कि अगर नाच का कार्यक्रम हीं रखना है तो इसके लिए वैदिक पाखंड क्यूँ ? शीला कि जवानी दिखने के लिए भगवान् कल्कि के नाम का उपयोग क्यूँ? ऐसे आयोजन से तो अच्छा है बिग बॉस कार्यक्रम, जिसके नाम से हीं ......... एवं मानसिक हीनता कि झलक मिल जाती है | कम से कम देखने वालों को पता तो होता है कि वे क्या देख रहे हैं | वस्तुतः, ये रंगे सियार (राजनेता, फिल्मकार, मिडिया) हीं हमारे देश के अस्तित्व को खा रहे है | ये हमें बता रहे हैं कि मोडर्न वो है जो अश्लील कपडे पहने, धोखाधड़ी करे, और बिना जरूरत के अंग्रेजी बोले | ये लोंगो को ये क्यूँ नहीं बताते कि देश में कई वर्षों से ढंग का कोई वैज्ञानिक नहीं पैदा हुआ क्यों कि हम विदेशियों द्वारा खोजे गए बातों को केवल रटते हैं, हमने स्वयं सोंचने कि क्षमता खो दी है | वे यह क्यूँ नहीं बताते कि sunny Leon को स्वयं उनके देश में कितनी इज्जत मिलती है ( पैसे को छोडिये, पैसा तो सोनिया जी के भी पास है ), ये इस बात को क्यूँ नहीं बताते कि सारे विकसित देशों में अपनी भाषा का हीं प्रचलन है |............ कहने को बहुत कुछ है अगर कहा जाय | संक्षेप में यही कहूँगा कि आपने जो रंगीन झांकी प्रस्तुत कि है वास्तव में वह भारतवर्ष के पतन का नमूना मात्र है .......sachchaai और भी भयावह है | बहुत-२ आभार आपका इस विशिष्ट आलेख के लिए |

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रसतॊगी जी आज देश  मे सूचना क्राित ने मानस पटल कॊ इतना प्रभािवत  िकया है  िक कॊई भी इसके मॊह से बच नही पाया है,चाहे वॊ नेता हॊ या अभिनेता, साधु हॊ या सनयासी,कवि हॊ या शायर हर कॊई अपने आप कॊ अधिक से अधिक प्रचारित करना चाहता है चाहे वॊ सामाजिक,धार्मिक या नैतिक मूलयॊं कॊ दॉंव पर लगाके ही कयॊं ना सभंव हॊ। जिनके हाथ मे हमारे सनातन धरम की परंपरा कॊ आगे बढाने का दायितव है वॊ ही भौतिकता की चकाचौंध में ऐसे चुधंयाये है कि उनहे उचित या अनुचित पर विचार करना पसंद ही नही है। जब धरम के प्रतीक माने जाने वाले साधु सनयासी फूहडता और अशशीलता कॊ आँख मूँदकर सवीकार करेंगे तॊ साधारण मानव से कया अपेक्षा की जा सकती है। ये बहुत ही गभींर और विचारणीय मुददा है जिसपर विदवान और सजग लौगॊं को चिंतन मनन करके चाहे कठॊर परंतु उचित निरणय लेना चाहिए ।

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कलयुग :::: मशीनों का युग =============== समाज मे एक आम धारणा प्रचलित है कि कलयुग मानवीय चरित्र के पतन का युग हैं। यह युग में मशीनों की बहुतायत है। कलयुग का एक अर्थ कलपुर्जों अर्थात मशीनों का युग है। इसलिए भी यह युग कलयुग कहलाता है। क्या इस युग सब बुराइयाँ ही बुराइयाँ है.....अच्छाइयाँ है ही नहीं? ऐसा नहीं है। मानवीय कमजोरियाँ हर युग में रही हैं। आज समाज में जो बुराइयाँ व्याप्त हैं वह सब पहले भी थीं किन्तु उस समय की राजनैतिक व्यवस्था में वह प्रचारित नहीं हो पाती थीं। अब सब कुछ बंद नहीं रहता है। इस युग की विशेषता है कि आदमी को पहले जैसा कठोर शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता है। बड़े-बड़े कार्य वह मशीनों की सहायता से अच्छा और जल्दी कर लेता है। इससे आदमी का विपरीत प्राकृतिक परिस्थियों में जीवन आसान हुआ है। इस युग की अनेक खूबियों के बीच एक बुरी बात भी पनपी है। वह यह कि मशीनों के बीच रहते हुए उसमे संवेदन-सून्यता समा जाना। इससे मानवीय संबंधों को ठेस पहुँची है। आज उसे तत्काल दूर किए जाने की आवश्यकता है। महोत्सव रसरंग के लिए किए जाते हैं.....जिसमें सहभागिता करने वालों के अपने अपने स्वार्थ होते हैं।

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कल्किमहोत्सव मे जिस तरह से लडकिया नाची है यह सन्यास धर्म का घोर अपमान है कल्कि मेले मे इन कलँकियों के  कारण हमारी सनातन परम्पराओ  को ठेस पहुची है, प्रमोदकृष्णम किस कल्कि भगवान की बात कर रहे है, पीस टी वी पर डां. जाकिर नाईक कई बार पुराणो का हवाला  देकर मौहम्मद साहब को कल्किअवतार     साबित करचुके है , इसी परम्परा मॆं क्या प्रमोदकृष्णम कल्कि महोत्सव  क राते हैं।लडकियां नचाकर प्राचीन परंपराओं को ध्वस्त करने से बेहतर है कि वे डां नाईक से शास्त्रार्थ करें लेकिन चालू  आइटम हैं करेंगें नहीं   शास्त्रार्थ करने में बुद्धि लगानी पडती है और छॊकरियां नचाकर मनोरंजन के साथ-साथ पूरे साल का जुगाड भी हो जाता है।        पता नहीं भोले हिंदू इन आस्तीन के सांपों को कब पहचानेंगें भाई मनोज जीआपका प्रयास सार्थक है।

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के द्वारा: करन बहादुर करन बहादुर

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मनोज जी, अन्ना  का आंदोलन मौका उठाने वालों के खिलाफ ही है। तभी तो कहता हूं कि व्यापारी अनाज में मिलावट बंद करें, दूध का कृत्रिम निर्माण बंद हो। किसान सब्जियों को रंगना बंद करें, लौकी, काशीफल जैसे फलों में इंजेक्शन लगाकर बढ़ा करना बंद करें, फलों में इंजेक्शन लगाकर मिठास नहीं भरी जाए। हैरानी की बात यह है कि सारा हंदुस्तान हजारे के साथ  रिश्वतखोर सरकारी कर्मी और नेताओं के खिलाफ खड़ा हो गया है। आंदोलन में उक्त काले कारनामे करने वाले भी शामिल हैं। मनोज जी, देश को समझाइये, हर तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हर देशी के खून में धन कमाने की लालसा बस गई है, तरीके चाहे कोई भी हो।  जन लोकपाल  बिल से नहीं हमें खुद बदलना होगा, तभी देश से भ्रष्टाचार का खात्मा हो सकेगा।

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बहुत खूब सर आनंद आ गया बहुत सुन्दर व्यंगात्मक कविता \\ बधाई स्वीकार करें .. इसी के आगे दो पक्तिय मेरी और से ... ------------------------------------------------------------------------- छोड़ो बच्चों जाए भाड़ में, पढ़ना और पढ़ाना || आओ मिलकर सिगरेट फूंके, ब्रांडेड वाला लाना || चंद पढ़ाकू बच्चों से तुम, पीछा मेरा छुडाओ | जाओ जाकर कैंटीन से, गरम समोसा लाओ | ------------------------------------------------------------------------ रात रात भर जाग जाग कर, उल्लू पढ़ते होंगे | नए शहर में वही पुराने, बुद्धू लगते होंगे || गृह परीक्षा में यदि तुमको, प्रश्न समझ ना आये | ऐसा फेंको और लपेटो \'डी\' कॉपी भर जाए || ------------------------------------------------------------------------ फिर तुमको अच्छे अंकों से, कौन रोक सकेगा | मैं सही यदि टिक लगाऊं, क्रोस कौन करेगा || समझो दोनों दुखियारों की, गाडी दौड़ पड़ेगी | डरो नहीं बस यही दौड़ है, दुनिया ख़ाक करेगी ||

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

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के द्वारा: अंशुमाली रस्तोगी अंशुमाली रस्तोगी

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सवेरे-सवेरे पांच बजे मेरी आंख खुली। लेकिन नींद पूरी नहीं होने की वजह से नींद अभी भी बोझिल थी। मेरी आंख दुबारा लग गई। लोग कहते हैं कि सुबह-सुबह आया स्वप्न सच होता है। आंख लगते ही एक स्वप्न मेरे दिमाग में स्पष्ट होकर घूमने लगा। एक कौवा महानगर की सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठा कांव कांव कर रहा है। आज पहली बार एक कौए की भाषा मेरी समझ में आई। उसकी कांव-कांव में बड़ा दर्द है। वह जोर-जोर से चिल्ला रहा है, ''मुझे पानी दो! कोई मुझे पानी दो!! मैं दूर-दूर तक घूम आया, कहीं पानी नही मिला है।'' मैंने उसे कहा, ''तुम यहां फुटपाथ पर क्यों बैठे हो? किसी ऊंचे भवन पर बैठकर पानी देखो।'' कौवा बोला, ''ऊंचे भवनों पर बैठकर तो बहुत चिल्ला लिया। अब सोचता हूं कि यहां बैठे को कोई जल दे दे।'' मैंने कहा, ''इनमें से तुम्हे कोई जल नहीं देगा। मनुष्य जाति बड़ी स्वार्थी हो गई है। ये लोग अपने काम के पीछे पागल हो गए है कि खुद पानी पीने की फुर्सत मुश्किल से निकाल पाते है, तुम्हे क्या पिलायेंगे। इनसे आस मत करो। जाओ उड़कर खुद पानी ढूंढ़ो। परिश्रम करो, कहीं ना कहीं जरूर मिल जायेगा। परिश्रम का फल हमेशा मीठा होता है।'' वह कहने लगा, ''कब से परिश्रम ही तो कर रहा हूं। पानी की तलाश में उड़ते-उड़ते मेरे प्राण सूख चुके है। सोचा था आज कहीं दूर की उड़ान भरूं, और दूर की उड़ान के चक्कर में उड़ता-उड़ता इस महानगर में निकल आया। अब इसमें भटक गया हूं। इन मकानों के जंगल के बीच से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा। और ना ही कहीं पानी है।'' मैंने कहा, ''तुम्हारे लिए यहां पानी नहीं है। पानी तो लोगों के मकानों के अंदर बंद है। मगर फिर भी कोशिश करो, कहीं न कहीं थोड़ा बहुत पानी जरूर मिल जायेगा।'' कौवा बोला, ''तुम्हारे मकान में भी तो पानी होगा। तुम मुझे पानी क्यों नहीं देते?'' मैंने सोचा, ''हां मैं भी तो इसे पानी दे सकता हूं।'' लेकिन पता नहीं क्यों मैं खुद को उसकी प्यास बुझाने में असमर्थ पाता हूं। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। और फिर मेरे कहेनुसार वह कौवा वहां से उड़ चला। थोड़ी दूर उड़कर वह एक मकान की छत पर जाकर बैठ गया। उससे उड़ा नहीं जा रहा। मालूम नहीं कैसे मैं भी वहीं पहुंच गया। कौवा फिर कुछ दूर उड़कर दूसरे मकान की छत पर बैठ गया। उसकी सांस फूली हुई है। उसका शरीर शिथिल पड़ता जा रहा है। उसमें चलने की भी हिम्मत नहीं है। पानी की तलाश में घूम-घूमकर थकान के कारण उसने अपनी प्यास और ज्यादा बढ़ा ली है। उस मकान की छत से उसे एक गंदा नाला दिखाई दिया। उस नाले का पानी उस कौए के रंग से भी ज्यादा काला है। शहर के कारखानों के जहरीले रसायन भी उसी नाले से होकर आते है। उसकी बदबू दूर तक महसूस की जा सकती है, लेकिन फिर भी उस कौए की प्यास की तड़पन उसे उस गंदे नाले की तरफ खींच ले गई। उसने उस नाले से एक चोंच भरी, मगर फिर उस गंदे पानी को वापस उलट दिया। वह सड़ा हुआ पानी उसके गले नहीं उतरा। मुझे उस तड़पते कौए को देखकर बड़ा तरस आ रहा है। उसकी स्थिति बड़ी दयनीय है। लेकिन मेरी समझ में ये बात नहीं आ रही कि मैं इसे पानी देने में खुद को असमर्थ क्यों पाता हूं। वह कौवा धीरे-धीरे अपने पंजों से जमीन पर कुछ दूर चला और एक दीवार की छांह में जाकर लेट गया। सूरज की चिलचिलाती धूप में वह दीवार भी उसे जलती हुई प्रतीत हो रही है। लगभग पंद्रह मिनट तक उसने आराम किया। आराम के कारण उसकी थकान को मामूली आराम जरूर मिला, मगर उसका गला लगातार सूखता जा रहा है। उसे आराम की नहीं थोड़े से जल की जरूरत है। वह अपनी पूरी ताकत लगाकर फिर से कुछ दूरी तक उड़ा और एक दीवार पर बैठ गया। वहां उसने देखा कुछ दूरी पर एक सत्संग हो रहा है। वो कौवा गुरु का ज्ञान सुन रहे भक्तजनों से कुछ दूर ही जमीन पर बैठकर कांव-कांव करने लगा। हालांकि उसमें बोलने की ताकत नहीं है। लेकिन फिर भी उसकी प्यास उसे जोर-जोर से बोलने पर मजबूर कर रही है। कोई भी उसकी भाषा नहीं समझ पा रहा, मगर मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही है। - ''पानी दो, मुझे दो घूंट पानी दो। मैं प्यास के मारे मरा जा रहा हूं। क्यों इस गुरु के चक्कर में अपना जीवन व्यर्थ कर रहे हो। मुझे पानी दे दो, तुम्हे देवता जैसा स्थान मिलेगा। मेरी प्यास बुझाओ, प्यास से मेरे प्राण निकले जा रहे है। मुझे पानी दो, पीने के लिए दो घूंट पानी दो। कौवा प्यासे हृदय से गिड़गिड़ा रहा है।'' सभी को उसकी कांव-कांव ही सुनाई देती है। तभी उनमें से एक व्यक्ति बोला, -अरे भगाओ यार इस कौए को, ये कुछ भी सुनने नहीं देता। इतना आनंद आ रहा था, इसने सारे पे पानी फेर दिया। भगाओ इसको। तभी उनमें से एक व्यक्ति उठा और हाथ हिलाते हुए कौए की तरफ बढ़ने लगा, ''जाता है कि नहीं यहां से।'' कौए ने दो पंख मारे और उस आदमी के जाने के बाद दुबारा कांव-कांव करने लगा, ''अरे दुष्टों दो घूंट पानी दे दो। प्यासे की प्यास बुझाओ, बड़ा सुख मिलेगा।'' तभी गुरु जी ने सभी को ध्यान में लीन होने के लिए कहा। सभी ध्यान में लीन हो गए। अब कौए की कांव-कांव की आवाज पहले से तेज सुनाई दे रही है। वही आदमी दुबारा उठकर आया और उसने जोर से कौए की तरफ एक पत्थर फेंका। बड़ी मुश्किल से उस पत्थर के प्रहार से कौए ने अपना बचाव किया और जैसे-तैसे उड़ा और कुछ दूर जाकर बैठ गया। उसका गला अधिक बोलने की वजह से हद से ज्यादा सूख चुका है। उसकी आंखें पथराई जा रही हैं। जमीन पर खड़ा होना भी उसके लिए मुश्किल है। मगर उसकी प्यास उससे उड़ान भरवा रही है। वो अभी भी चिल्ला रहा है। कुछ देर बाद अपनी पूरी शक्ति लगाकर पानी के लिए फिर उड़ा। मगर इस बार उसके शरीर ने उसका साथ नहीं दिया। दो चार पंख फड़फड़ाकर वह कौवा बेहोश होकर सड़क पर जा गिरा। एक तेज रफ्तार से आती हुई कार उसके ऊपर से निकल गई और उसके खून के छीटे मेरे चेहरे पर आ गिरे। एक झटके के साथ मेरी आंख खुल गई। इस प्रकार उस कौए की प्यास बुझी। मेरा दिल बहुत दुखी हुआ। उस कौए की वही आवाज 'मुझे पानी पिलाओ' अभी भी मेरे कानों में गूंज रही है। लोग कहते है कि सुबह-सुबह आया स्वप्न भविष्य में होने वाली घटनाओं की सच्चाई को बयां करता है। अब मैं अपने बिस्तर पर बैठा सोच रहा हूं, शायद आने वाला वक्त पशु-पक्षियों के लिए ऐसा ही हो। जब इंसान को खुद के लिए पानी की कमी महसूस होगी, तो वो पशु-पक्षियों को पानी क्यों देगा। पशु-पक्षी ऐसे ही प्यास से तड़पते-तड़पते मर जायेंगे। अगर उन्हे कहीं जल मिलेगा भी तो उन्हे इतना गन्दा जल नसीब होगा जो इंसान की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले कारखानों और फसलों में गिरने वाले रसायनों के कारण जहरीला हो चुका होगा। उस अकेले कौए की हालत ऐसी नहीं होगी। सभी पशु पक्षियों की यही हालत होगी और इसका जिम्मेदार होगा इंसान, डान छैत्री आसाम

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