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मुरादाबाद में भी जगी थी हिंदी की अलख

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उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तराद्र्ध और बीसवीं शताब्दी का पूर्वाद्र्ध। यह वह समय था जब अंग्रेजों की हुकूमत की बेडिय़ों से मुक्ति का शंखनाद हो रहा था। वहीं दूसरी ओर हिंदी के प्रचार- प्रसार की अलख भी जग रही थी। मुरादाबाद भी इससे अछूता नहीं था। अंग्रेज शासकों के हिंदी विरोधी कदमों का यहां भी जमकर विरोध हुआ। आजादी से पहले हिंदी को प्रतिष्ठित करने के लिए मुरादाबाद में भी क्रांति का बिगुल बजा।
मुरादाबाद में हिंदी के प्रचार कार्य के लिए सुप्रसिद्ध कथाकार पंडित ज्वाला दत्त शर्मा के नेतृत्व में सन् 1912 में हिंदी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। सन् 1920 में इस संस्था का नाम नागरी प्रचारिणी सभाकर दिया गया । इसी साल यहां पंडित पद्मसिंह शर्मा साहित्याचार्य के सभापतित्व में प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में सभा का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। यही नहीं इस संस्था की ओर से समय -समय पर गोष्ठियों का आयोजन कर हिंदी के प्रचार -प्रसार में योगदान दिया जाता रहा। वहीं अंग्रेज शासकों के हिंदी विरोधी कदमों के खिलाफ समय- समय पर आवाज भी उठाई जाती रही । अंग्रेज सरकार द्वारा मैथिलीशरण गुप्त की पुस्तक भारत भारती को जब्त करने का प्रकरण हो या सीमा प्रांत की सरकार द्वारा सन् 1935 में सहायता प्राप्त विद्यालयों में गुरुमुखी व देवनागरी का प्रयोग वर्जित करने का या फिर सन् 1938 में अनवर राज्य में हिंदी के स्थान पर उर्दू को राज भाषा बनाए जाने का निर्णय ही क्यों हो। यहां के हिंदी सेवियों ने इसका पुरजोर विरोध किया और सभा की बैठकों में इन कृत्यों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किए।
राजकीय व अदालती कार्यो में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए न केवल अभियान चलाया गया बल्कि सभा की ओर से दीवानी अदालत में एक ऐसे व्यक्ति की व्यवस्था की गई बिना शुल्क लिए लोगों की अर्जी हिंदी में लिखता था। यही नहीं कचहरी मुरादाबाद में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए साहू रमेश कुमार द्वारा एक हिंदी टाइपराइटर की व्यवस्था की गई और कटघर निवासी कालीचरण को दस रुपये प्रतिमाह पर नियुक्त किया गया।
नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से काशी विश्व पंचांग के आधार पर नवसंवत्सर पर तिथिपत्र प्रकाशित किया जाता था। इसे पंडित रामचंद्र शर्मा तैयार करते थे। उन्होंने ही मुरादाबाद में पहली बार हिंदी साहित्य सम्मेलन की कक्षाएं प्रारंभ की थीं। हिंदी भाषा, व्याकरण, हिंदी साहित्यकार और उनकी रचनाओं पर लिखित उनकी पुस्तक सुमन संचय उस समय विद्यार्थियों में सर्वाधिक लोकप्रिय थी । इस पुस्तिका की भूमिका महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने लिखी थी।
सन् 1939- 40 में कवि दयानंद गुप्त और अन्य हिंदी सेवियों ने हिंदी परिषद की स्थापना की। वसंत पंचमी पर आयोजित परिषद के पहले वार्षिकोत्सव को वह कभी विस्मृत नहीं कर सकते हैं। दो दिवसीय इस आयोजन में काका कालेलकर, जैनेंद्र कुमार, डा. नगेंद्र आदि साहित्यकारों के व्याख्यान हुए थे। अंतिम दिन पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की अध्यक्षता में काव्य संध्या का आयोजन हुआ था।
डा. मनोज रस्तोगी
8, जीलाल स्ट्रीट
मुरादाबाद- 244001
मोबाइल फोन – 9456687822

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yatindranathchaturvedi के द्वारा
October 3, 2013

अद्भुत, सादर

kavya Rastogi के द्वारा
September 15, 2013

मनोज जी, हिंदी साहित्य का इतिहास तो हम सबने पढ़ा है पर राष्ट्रभाषा के सम्मान के लिए मुरादाबाद के संघर्ष का जो इतिहास आपने संकलित किया, वह प्रशंसनीय है. इस रोचक एवं संग्रह योग्य लेख के लिए धन्यवाद और आज के इस भौतिकतावादी युग में हिंदी के प्रति यह भाव रखने के लिए मेरा नमन.


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