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...जहां अंग्रेज पुलिस ने बरसाईं गोलियां

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मुरादाबाद के पान दरीबा पर एक तरफ गूंज रहे थे ‘भारत मां की जय, वंदेमातरम्’ तो दूसरी तरफ गूंज रही थी गोलियों की तड़तड़ाहट। देखते ही देखते पान दरीबा से मंडी चौक तक के मोहल्लों की गलियों में खून के छींटे बिखर गये। हां, यही नजारा था दस अगस्त सन उन्नीस सौ बयालिस के दिन।
भारत छोड़ो आंदोलन के तहत सन् बयालिस में नौ अगस्त को यहां भी आजादी के मतवालों की गिरफ्तारियां शुरू हो गई थी। दाऊ दयाल खन्ना को मुहल्ला अताई से गिरफ्तार कर लिया गया। जैसे ही इसकी जानकारी लोगों को हुई तो मंडी चौक ही नहीं पूरे शहर में जनाक्रोश भड़क उठा। अंग्रेज सरकार के खिलाफ अगले दिन जुलूस निकालना तय हुआ। दस अगस्त को लोग पान दरीबा पहुंचने शुरु हो गए। देखते ही देखते वहां सैंकड़ों लोग पहुंच चुके थे। हर चेहरा तमतमाया हुआ था। जुलूस शुरु होता कि वहां अंग्रेज पुलिस पहुंच गई। पुलिस को देखते ही आजादी के दीवाने भड़क उठे और उन्होंने भारत मां की जय, वंदेमातरम् और अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगाने शुरु कर दिये। पूरे माहौल में उत्तेजना और आक्रोश। भीड़ को तितर बितर करने के लिए अंग्रेज पुलिस ने हवाई फायर किया तो पथराव शुरु हो गया। इस पर क्रोधित पुलिस कर्मियों ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसानी शुरु कर दीं। पान दरीबा से अताई मुहल्ले तक गोलियां बरसती रहीं और लोग जख्मी होते गये। देखते ही देखते पान दरीबा, गुजराती मुहल्ला, पुजेरी गली, दिलवाली मुहल्ला, अताई मुहल्ला और जीलाल मुहल्ले की सड़कों पर खून के छींटे बिखर गए। गोली कांड में मुहल्ला भट्टी निवासी पं. बाबू राम का ग्यारह वर्षीय बालक जगदीश प्रसाद शर्मा शहीद हो गया तो प्रेम प्रकाश अग्रवाल के पेट को चीरती हुईं गोलियां निकल गई और प्रेम प्रकाश ने छटपटाते हुए दम तोड़ दिया। गोलियां लगने से झाऊलाल, मुमताज और मोतीलाल के भी प्राण पखेरु उड़ गए। लगभग दो सौ व्यक्ति घायल हो गये। फायरिंग में एक गोली वहां लोहे के पाइप में भी लगी थी, जिससे उसमें चार सूत का सुराग हो गया था। अंग्रेजों की बर्बरता के एक गवाह प्रेम प्रकाश बंसल के पास यह पाइप बरसों तक सुरक्षित रखा रहा। बाद में उनके प्रयासों से वर्ष 2005 में पान दरीबा पर शहीद स्मारक की स्थापना हुई और पाइप वहां स्थापित कर दिया गया।

डा मनोज रस्‍तोगी

मुरादाबाद (उप्र)



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
August 19, 2012

रस्तोगी जी, परतंत्रता-स्वतंत्रता से जुड़ी ऐसी न जाने कितनी मर्मांतक घटनाएँ हैं, जो इतिहास के पन्नों पर न आ सकीं | ‘मुरादाबाद के पानदरीबा’ की ऐतिहासिक पीड़ा को स्मरणीय रूप में उजागर करने के लिए हार्दिक साधुवाद !

ashishgonda के द्वारा
August 11, 2012

आदणीय! मैं आपसे और और आपके इस लेख के पहली प्रतिक्रिया करने वाली मेम से बिलकुल सहमत हूँ. बहुत खूब……

nishamittal के द्वारा
August 11, 2012

ये ही वो शहीद हैं जिनका नाम आप सदृश कुछ लोग याद कर लेते हैं,परन्तु देश के प्रति अब ये भावनाएं न नेताओं में हैं न ही जनता में


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