blogid : 3327 postid : 207

प्रार्थना

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मंदिरों में हो रही है
पूजा-अर्चना

और

गिरजाघरों में
प्रार्थनाएं

मस्‍िजदों में
आसमान की ओर
उठ रहे हैं – सैकडों हाथ
अल्‍लाह मेघ दे ,पानी दे
वह

बैठा चुपचाप
ताक रहा है
अपने घर की छत
और
कर रहा है
मन ही मन प्रार्थना

हे, इंद्र देव
अभी , कुछ दिन और
बनाए रखना
मुझ पर अपनी कृपा
प्रभु , अपनी कृपा

*** डा मनोज रस्‍तोगी
8, जीलाल स्‍ट्ीट
मुरादाबाद ( उप्र )



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (11 votes, average: 4.73 out of 5)
Loading ... Loading ...

16 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
September 3, 2013

बहुत अच्छी कविता। “जीवन आधार” और” मेरे अराध्य राम” पढ़ने का कण्ट करें।

deepakbijnory के द्वारा
August 15, 2013

बेहद उम्दा और सहज

graceluv के द्वारा
March 11, 2013

Hello Dear! My name is Grace, I saw your profile and would like to get in touch with you If you’re interested in me too then please send me a message as quickly as possible. (gracevaye22@hotmail.com) Greetings Grace

balbirsingh के द्वारा
November 6, 2012

बहुत अच्छी कविता है।

meenakshi के द्वारा
July 31, 2012

मनोज रस्तोगी , जी नमस्कार ! कितना आश्चर्य है कि- एक प्रार्थना किसी के लिए वरदान स्वरुप होती है तो किसी अन्य के लिए अभिशाप.. बहुत अच्छा लिखा , आपने. मीनाक्षी श्रीवास्तव

MAHESH NARAYAN ROY के द्वारा
July 17, 2012

बेघर बेपर्द के लिए वर्षा की बूंदें तीर के फलक के समान चुभता है i ऐसे लोगों की आवाज उठाने के लिए रस्तोगीजी को बहूत बहूत धन्यवाद् I महेश नारायण रॉय I

spdimri के द्वारा
July 13, 2012

अभावों  का संसार …दुआ ही  मना सकता है…बेहद सुन्दर  भाव पूर्ण अभिव्यक्ति शुभ कामनाएं एवं  सादर अभिनन्दन ऍऍ

DHARMENDRA के द्वारा
July 11, 2012

SIR,REALY I AM HAPPY AFTER READ YOUR POEM.

sunilchoudhary के द्वारा
July 10, 2012

बहुत खूब मनोज रस्तोगी जी,,,

satya sheel agrawal के द्वारा
July 4, 2012

रस्तोगी जी समयानुकूल रचन्ना की है आपने

rajuahuja के द्वारा
July 4, 2012

रस्तोगी जी , सच तो सच है लेकिन जुदा-जुदा ! यह एक मजदूर/कुम्हार/और फुटपाथ पर रैन बसेरा लिए गरीब का सच है !आइना वही मगर शक्लें जुदा-जुदा !

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    July 4, 2012

    सही कहा आपने, बरसात में जब छत टपकती है तो इसका दर्द भुक्‍तभोगी ही जानता है।


topic of the week



latest from jagran