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पीढिय़ों का संघर्ष- उत्तरदायी कौन?

Posted On: 19 Mar, 2012 Others,मेट्रो लाइफ में

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पीढिय़ों का संघर्ष आज की ज्वलंत समस्या है । पाश्चात्य शिक्षा पद्धति , अर्थ प्रधान समाज तथा अनेक प्रकार के सामाजिक ,मनोवैज्ञानिक कारणों से नई व पुरानी पीढिय़ों में संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप ईष्र्या ,द्वेष, कलह, उन्माद, निराशा तथा मानसिक उद्वेग बढ़ रहे हैं। कभी -कभी तो इस संघर्ष से उत्पन्न मानसिक तनाव- गृह क्लेश, पागलपन तथा आत्महत्या तक में परिणत होते देख गया है। इस प्रकार के तनाव से
जीवन में कटुता ,विषाक्तता और रिक्तता भरी रहती है जिसके कारण आत्मविश्वास के सारे मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।
वर्तमान में ज्यादातर देखने में आ रहा है कि युवा वर्ग वृद्धों का अनादर कर रहा है तो बुजुर्ग पीढ़ी को युवाओं की स्वछंद जीवन शैली नहीं भाती है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इन पीढिय़ों के संघर्ष के लिए उत्तरदायी कौन है? कुछ लोगों का मानना है कि बुजुर्ग आज के युवक -युवतियों पर तीखी टीका-टिप्पणी करते है । कहते हैं कि हमारे जमाने में तो मर्यादा थी । अब तो ऐसा लगता है कि सारी लाज-शर्म बेच खाई है । वहीं कुछ लोगों का कहना है कि बुजुर्ग सदैव ही दकियानूसी व आउट ऑफ डेट परंपराओं को ढो रहे हैं। स्थिति यह है कि युवा पीढ़ी को अपनी जीवनशैली में दादा-दादी तो दूर ,माता-पिता की दखलअंदाजी तक सहन नहीं होती। ठीक है कि पीढिय़ों के संघर्ष में ये कारण हो सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि इसका प्रमुख कारण हमारी
संस्कार विहीन शिक्षा है।आज की शिक्षा में मूल्यों का नितांत अभाव पाया जाता है। हम परस्पर कैसा व्यवहार करें ? परिवार में एक-दूसरे के साथ संबंध कैसे हों ? दया, प्रेम,सेवा ,त्याग व सहनशीलता का जीवन में कितना मूल्य है ? माता-पिता , दादा-दादी के प्रति हमारा क्या कत्र्तव्य है? हम आज यह सब भूलते जा रहे हैं। संस्कार हीनता के कारण पीढिय़ों के मध्य दरारें पैदा होती जा रही हैं।
दूसरा मुख्य कारण है आर्थिक परिस्थितियां । बढ़ती महंगाई,बेरोजगारी, गरीबी, अल्प आय आदि ऐसे अनेक कारण हैं जिनकी वजह से परिवार में अधिक सदस्यों की संख्या, घर के खर्चों के बीच बुजुर्गों की बीमारी बोझ स्वरूप लगती है।
तीसरा कारण है आज की यंत्रवत जीवनशैली। सुबह से शाम, काम ही काम। किसी शायर ने कहा है कि सुबह होती है, शाम होती है,उम्र यूं ही तमाम होती है। इन स्थितियों में जीवन मूल्यों ,आदर-अनादर,सेवा की आशा करना बेमानी है। बुजुर्ग अपने बेटे-बहुओं की व्यस्तता को नजरांदाज कर उसे अपनी उपेक्षा मानने लगते हैं। बस यहीं से शुरू हो जाती है संंघर्ष की शुरूआत।
चौथा कारण है सामाजिकता का अभाव । इसके कारण मानवीय संवेदनाएं व्यक्ति उन्मुख होती जा रही हैं ।
इन तमाम स्थितियों के बीच दोनों पीढिय़ों के बीच सामंजस्य कैसे हो। यह एक यक्ष प्रश्न है। कहावत है कि बच्चा-बूढ़ा एक समान । अगर युवा पीढ़ी इसे समझ जाएं तो समस्या का काफी हद तक समाधान हो जाएगा। वहीं बुजुर्गो को भी अपनी जीवन शैली में थोड़ा बदलाव कर युवा पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिला कर चलने का प्रयास करना चाहिए।

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40 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
September 3, 2013

नयी पीढ़ी यानी वर्तमान युवा पीढ़ी और बुजुर्ग पीढ़ी में सामन्जस्य नहीं।आपने गिरते समाजिक स्तर को अपने लेख में व्यक्त किया। बहुत अच्छा। “माँ-बाप की व्यथा” पढ़ने का कण्ट करें।

abha dwivedi के द्वारा
March 31, 2012

नहीं, परिस्थितियाँ परिवर्तित हो रही हैं ! और भी बहुत से कारण और स्थितियाँ इन सबके लिए जिम्मेदार हैं ….इन सबके बावजूद आज की पीढ़ी कहीं न कहीं जागरूप भी है …………. आप समाज की बहुत गंभीर समस्या को प्रकाश में लाये हैं !! आपके द्वारा प्रस्तुत तीसरा और चौथा बिंदु ….. आज के जीवन का सबसे बड़ा सच है, महत्वपूर्ण कारन भी !!!! बुद्धिजीविता के अनुसार चिंतित होना लाजिमी है ……….. बहुत बधाई ………….!!

kavya के द्वारा
March 25, 2012

बंधुवर, दिशाहीन होती इस युवा पीढ़ी और उपेक्षित वृद्ध जनों की वास्तविकता को उजागर करने वाले इस सशक्त ब्लॉग हेतु बधाई स्वीकार करें.

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 26, 2012

    धन्‍यवाद काव्‍य जी।

sanjay rustagi के द्वारा
March 24, 2012

बधाई बधाई

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    March 24, 2012

    अभी कहां, अभी तो आपकी शुभकामनाएं चािहए। सफर अभी बाकी है।

March 23, 2012

सादर प्रणाम! अर्थपूर्ण और विचारणीय बिंदु ……………….हार्दिक आभार!

satya sheel agrawal के द्वारा
March 23, 2012

मनोज जी ,परिवार में सामंजस्य बैठा पाना इसी कारन मुश्किल होता जा रहा है परिवार टूट रहे हैं.समाज बिखर रहा है.मैंने भी आज की इस ज्वलंत समस्या का काफी अध्ययन किया है, शीघ्र ही पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की कोशिश करूँगा.धन्यवाद

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    March 24, 2012

    भाई साहव, स्‍वागत है आपका । आपकी लेखनी से इस िवषय पर कुछ और नए पक्ष उद़्घािटत होंगें ।

div81 के द्वारा
March 22, 2012

दो पीढियों के विचारों में असमानता वो कड़वी सच्चाई है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। और इस असमानता को तभी पाटा जा सकता है दोनों ही तरफ से एक सार्थक प्रयास हो | भौतिकवादी सोच के चलते एकाकी परिवार बढे है और सामाजिक मूल्यों का जो ह्रास हुआ है उसी का नतीजा है | विचारणीय आलेख

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    March 24, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार । हमें सामाजिक मूल्यों के हो रहे ह्रास को रोकने के लिए पहल करनी ही होगी । यह तभी संभव है जब हम अपनी सार्थक परंपराओं व संस्‍कृित से जुडे रहें।

mrigank pandey के द्वारा
March 22, 2012

प्रिय मनोज जी, सबसे पहले तो हमारी बधाई भरा बंडल, टोकरा या जो भी समझें, स्‍वीकारें। अब बधाई भरा टोकरा बगल में दबाकर जरा एकल परिवार व ज्‍वाइंट फैमिली पर आ जाएं। मेरा मानना है कि संयुक्‍त परिवार प्रथा पीढियों के संघर्ष को थोडा कम कर सकती है। एकल परिवार, जहां अगली पीढी के मां बाप दोनों कामकाजी हैं, उनके पास इतना वक्‍त नहीं कि वो अपनी पीढी को सुसंस्‍कारित कर सकें। नई पीढी में जब तक संस्‍कारों की खाद और सुविचारों का पानी नहीं पडेगा, संघर्ष कायम रहेगा। क्‍या विचार है आपका।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    March 24, 2012

    पीढियों के संघर्ष के कारण ही संयुक्‍त परिवार टूट रहे हैं। आपका कहना सही है िक नई पीढी में जब तक संस्‍कारों की खाद और सुविचारों का पानी नहीं पडेगा, संघर्ष कायम रहेगा। समाज को इस दिशा में सोचना चाहिए। मीडिया इस दिशा में पहल कर सकती है लेकिन अफसोस है कि आज टीवी पर हर चैनल इसे बढावा ही दे रहा है।

vivek ranjan shrivastava के द्वारा
March 22, 2012

वैचारिक आलेख हेतु और श्रेष्ठ ब्लागर के रूप में चयन हेतु मेरी बधाई स्वीकारें

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्‍यवाद ,विवेक जी।

shailesh001 के द्वारा
March 21, 2012

इसका बस एक कारण है और एक समाधान… जिसके बारे मे बात करना जरूरी है…

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    शैलेश जी ,क्‍या कारण है और उसका समाधान क्‍या हो सकता है । इस पर प्रकाश डालने की कृपा कीिजएगा। आभारी रहुंगा । न्‍यवाद।

brijendra vats के द्वारा
March 21, 2012

aapne bahut hi samajik aur marmik vishay par bahas shuru ki h badhai is trasdi ka ek aur paksh h sanyukt pariwar ka tootna sanyukt pariwaro main ladne jhagne k baad bhi ek jagah par baithker bhojan karne ki vivshta thi jahir h ki jhagdo ke karano par bhi charcha hoti aur bhojan k beech hi kahi samsya ka nidan doond liya jata tha is sammelan main kai peediyan ek saath hoti thi isliye aksmaat hi samanjasya baith jata tha lekin aaj ekal pariwaro ke chalan main koi kisi ki mansthiti ko samjhane ko taiyyar hi nahi h . aapka kahna bilkul theek h is visheile vatavaran ko banane main hamari shiksha bahut badi bhumika nibha rahi h jo samaj se kate moti pagar ki jugad main lagne wale sharamiko ko taiyyar kar rahi h pariwarik, saamajik sarokaron se is taaleem ka chimte se chhune jaisa vaasta bhi nahi h . is samay maikale khud ko bahut yashaswi maan raha hoga woh bharat main jaisi nikrisht soch chahta tha vaisi ban chuki hweh pdakar sirf babu bana chahta tha aaj uske utrradhikarion ne majdooron ki fouj taiyyar kar di h

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    भाई साहब, बहुत बहुत आभारी हूं िक आपने इस पक्ष पर भी प्रकाश डाला । संयुक्‍त परिवार का खत्‍म होना भी पीढियों के संघर्ष का  दुष्‍परिणाम है। इसका दंुष्‍प्रभाव बच्‍चों  पर पडृ रहा है और वे संस्‍कारविहीन होते जा रहे हैं।

Govind Bharatvanshi के द्वारा
March 21, 2012

आदरणीय डॉ.साहब ,.सादर नमस्कार आम होती गंभीर समस्या पर प्रभावी आलेख के लिए आपको हार्दिक साधुवाद बदलती जीवन शैली और घटते पारिवारिक सामजिक मूल्य समस्या को बढ़ावा देते हैं ,..आपका सुझाव सही है की दोनों ही पक्षों को मिलकर सामंजस्य बिठाना चाहिए .. प्रतियोगिता के लिए ब्लॉग चयनित होने की बधाई ,.और हार्दिक शुभकामनाये ..सादर आभार

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्‍यवाद गोिवंद जी। अगर हम समय रहते नहीं चेते तो इस समस्‍या से भविष्‍य में हमें भी जूझना

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्‍यवाद गोिवंद जी। अगर हम समय रहते नहीं चेते तो इस समस्‍या से भविष्‍य में हमें भी जूझना  पडेगा क्‍योंकि आज हम िजस विषवृक्ष को सींच रहे हैं उसका फल भी तो हमें ही मिलेगा।

Omprakash Shankhdhar के द्वारा
March 21, 2012

मनोज जी आपका आलेख आज के बदलते सामाजिक परिवेश की एक बेहतर तश्वीर खींचने की सार्थक कोशिश गए आप बधाई के पात्र है

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्‍यवाद शंखधार जी,काश ये कोशिश सफल हो जाए।

Divya shukla के द्वारा
March 21, 2012

 आज के  समाज की  सबसे  ज्वलंत  समस्या  उठाने  के  लिये  धन्यवाद  आपको  – आज  माँ  बाप  व्यस्त  है  और  बच्चे  आया  और  नौकर  के  बल  पर  पल  रहे  है  क्यों की  संयुक्त  परिवार  खतम  हो  गये  है  लगभग कामकाजी  माँ बाप  भी  अपनी  स्वतंत्रता  चाहते  है  घर  पर  बुजुर्ग  पुराने  आउट डेटेड  समान  की  भांति  या  घर  के  पिछले  हिस्से  में  या  अलग  एकाकी  दूसरे  शहर  में  फिर  बच्चे  कैसे  सीखें  सम्मान  और  एक  दूसरे  से  मिलबांट  कर  रहना  संस्कार  यह  तो  बड़ों  से  मिलता  है  उनका  लिहाज़  ही  अनुशासन  सिखाता  है  –  अगर  आज लोग  संयुक्त  परिवार  और  बुजुर्गो  का  महत्व  समझ  ले  तब  शायेद  काफी  हद  तक  समाधान  हो  जाये  वरना  नई  पीढ़ी  निरंकुश  होती  जायेगी  और  ओल्ड होम  बढते  जायेंगे  —-

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    आपके विचारों से मैं सहमत हूं,दिव्‍या जी। िपछले दिनों दैनिक जागरण ने स्‍कूली बच्‍चों के बीच संस्‍कार शाला प्रतियोगिता का आयोजन कर एक महत्‍वपूर्ण पहल भी की थी। हम सभी को इस िदशा में गंभीरता से िचंतन करना चािहए।

neeraj vashitha के द्वारा
March 20, 2012

दरअसल, जीवन ऐसा नहीं है जैसा हमने समझ रखा है , ठीक वैसे ही हमारी जीवन शैली वह नहीं है जिसे हमने आज के परिवेश में अंगीकार कर लिया है। यही विरोधाभाष, तनाव उत्‍पन्‍न करता है। यह खींचता है एक तल से दूसरे तल की ओर। हम सुगमता जहां पाते हैं उस तल पर चले जाते हैं। भौतिक आकर्षण से हमने जो आचरण आज हम कर रहे हैं, वह हमारे स्‍वभाव के प्रतिकूल है। इसलिए यह सारी समस्‍याएं जिसका आप जिक्र कर रहे हैं उत्‍पन्‍न हो रहे हैं। दूसरी बात, संवाद की कमी। आज परिवार से बुजुर्ग खो सा गया है , अस्‍सी प्रतिशत बच्‍चे बिना किसी बुजुर्ग के साए में पल रहे हैं, माता पिता व्‍यस्‍त हैं, उनमें एकाकी पन है, वह अपनी विरासत को नहीं जातने हैं, इसलिए जब वो ऐसा कुछ आचरण करते हैं तो हम गाली देते हैं, यह एक तरह से आत्‍महीनता को दर्शाता है। हमने ऐसा बीज ही बोया है तो फल वैसा ही मिलेगा। आपने इस विषय को उठाया, जिसपर पूरे देश को चिंता की जरूरत है, आपको धन्‍यवाद देता हँ।

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    सही कहा आपने नीरज जी, हमें भौतिकतावाद से निकल कर अपने आचरण में परिवर्तन करना ही होगा। इस बहस में शािमल होने के िलए आपका बहुत बहुत आभार ।

satya sheel agrawal के द्वारा
March 20, 2012

मनोज जी .काफी हद तक आपकी बात सही है परन्तु यह एक ऐसा विषय है इस पर जितना भी लिखा जाय थोडा ही है .बढती भौतिकता,एवं निरंतर तेजी से हो रहे बदलाव, पीढ़ियों के टकराव का कारण बन रहा है इसको बुजुर्ग जितने जल्दी स्वीकार कर लेगा उसके लिए सामंजस्य कर पाना आसान हो जायेगा.प्रेरणादायी विश्लेषण

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    मान्‍यवर, इस दिशा में युवा वर्ग को भी गंभीरता से मंथन करना होगा।

alkargupta1 के द्वारा
March 20, 2012

रस्तोगी जी , आज के बदलते समय में दोनों ही पीढ़ियों में सामंजस्य की और एक दूसरे की भावनाओं को समझने व सम्मान देने की अति आवश्यकता है तभी हम अपनी परम्पराओं व संस्कृति को सुरक्षित रख सकते हैं…….बहुत ही अच्छे विषय पर विचारणीय आलेख !

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    बहुत बहुत आभार अलका जी। ताली दोनों हाथों से ही बजती है।

ramesh mishra के द्वारा
March 19, 2012

समाज पर परंपरा के साथ संस्‍कारों को भूल रहे भारतीय समाज की अच्‍छी रूपरेखा। शब्‍दों का उत्‍तम संयोजन के साथ पूरी तरह से बैलेंस आलेख। बधाई

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    परंपराओं से विमुखता आज की सबसे बडी त्रासदी है।

nishamittal के द्वारा
March 19, 2012

आदरनीय रस्तोगी जी,पीढी अंतराल के कारण उत्पन्न विवाद पर आपका प्रभावशाली आलेख ज्ञानवर्धक है.कृपया इसी विषय पर मेरा एक पूर्व आलेख भी पढने का कष्ट करें.http://nishamittal.jagranjunction.com/2011/07/24/चार-कदम-हम-चलें-तो-दो-आप-भी/

    डा मनोज रस्‍तोगी ,मुरादाबाद (उप्र) के द्वारा
    March 22, 2012

    निशा जी, इस समस्‍या पर जितनी बार लिखा जाए उतना कम है। आपने तो अपने लेख चार कदम हम चलें तो कदम आप भी  में इसका बहुत प्रभावशाली िवश्‍लेषण िकया है।  मैं आपके विचारों का पूर्ण रूप से समर्थन करता हूं।

amitesh के द्वारा
March 19, 2012

समस्या तो सदियों से एक सी है हर पीड़ी के विचार भिन्न होते है जीवन शैली अलग होती है ……..पर यदि हम आज के परिवेश की बात करे तो …..मुझे लगता है ..यदि बुजर्ग अपनी हटधर्मिता त्याग कर ….युवाओं को समझाए और समझने कि कोशिश करें ……..युवा पीड़ी थोड़ी लोजिक्ल है ……यदि आप परंपराओं, मूल्यों, संस्कारों का लोजिक उन्हें समझाए तो अंतर आ सकता है …………..और यही बात युवायों के लिये भी लागू है ..जो वों करते है या करना चाहते है उसका कारण बुर्जुर्गो को समझाए …..यदि सम्प्रेषण का गड्डा बढेगा ……तो पीड़ी गड्डा भी पट जाएगा ……….

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    March 19, 2012

    सही कहा आपने । एक दूसरे की भावनाओं को समझना बहुत जरूरी है।


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