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...धमकाने के दिन आ गए

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रिझाने के दिन आ गए ।

लुभाने के दिन आ गए ।।

पांच साल में लगी आग ।

बुझाने के दिन आ गए ।।

आपके जख्‍मों पर मरहम।

लगाने के दिन आ गए ।।

पलकों पर मियां आपको ।
बैठाने के दिन आ गए ।।

आपसे हमें प्‍यार कितना ।

जताने के दिन आ गए ।।

गांवों की पगडंडियों पर ।
बतियाने के दिन आ गए ।।

चेहरा दिखा कर ये दिल ।

जलाने के दिन आ गए ।।

भूल चुके वादों की याद ।
दिलाने के दिन आ गए ।।

ठंडे पडे मुद़दों को फिर ।

उठाने के दिन आ गए ।।

गली-गली घूमकर तमाशा ।
दिखाने के दिन आ गए ।।

दोनों हाथों से यारों पैसा ।
लुटाने के दिन आ गए।।

जो जिद पर अडे हैं उनको ।

धमकाने के दिन आ गए ।।

दुश्‍मनों के साथ खिचडी ।
पकाने के दिन आ गए ।।

मात देने के लिए गोटियां ।

बिछाने के दिन आ गए।।

इस महासमर में परचम।
लहराने के दिन आ गए ।।

इस बार न करना गलती ।

सिखाने के दिन आ गए ।।



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69 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 5, 2012

पोस्ट दिल को छू गयी…….कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने……….बहुत खूब बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

TARUN DIXIT के द्वारा
May 3, 2012

मनोज जी सादर नमस्ते , जब 5 मिनट की आग सेलाब मचा देती है तो ये 5 साल की आग को कुछ ऐसा करेगी की मैं सोच भी नहीं सकता | अति सुन्दर | मेरी एक कविता आप से मिलती जुलती है ‘वो दिन आ गए’ | तरुण दीक्षित tarundixitrpk@gmail.com

Mohinder Kumar के द्वारा
April 24, 2012

मनोज जी वाह चुनावों के माहोल का क्या बढिया चित्रण किया है आपने अपनी इस रचना के माध्यम से… पढवाने के लिये आभार.

aashutoshmishra के द्वारा
February 7, 2012

आदरणीय, डा मनोज जी, शानदार रचना…बधाई…. अनुरोध है इसे भी पढ़े … http://aashutoshmishra.jagranjunction.com/2012/02/06/%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A5%8B%E0%A4%9F/

अलीन के द्वारा
February 2, 2012

डॉ साहब, शुभप्रभात! चुनावी माहौल को व्यक्त करती स्मरणीय कविता….

cb Singh के द्वारा
January 31, 2012

बहुत खूब कहा है | http://www.hindisahitya.org पर अपनी कवितायें प्रकाशित करें |

baijnathpandey के द्वारा
January 28, 2012

आदरणीय श्री रस्तोगी जी सादर अभिवादन रिझाने के दिन आ गए । लुभाने के दिन आ गए ।। पांच साल में लगी आग । बुझाने के दिन आ गए ।। ….. बेहद कसे हुए व्यंग-वाण, सीधे निशाने पर जा कर लगे हैं. पर उन्हें क्या जो अपने काम में लगे हैं, भले अप, हम हासिये पर खड़े हैं . वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें एवं आभार !!!

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 31, 2012

    पाण्‍डेय जी , काव्‍यात्‍मक प्रतििक्रया के िलए आपका बहुत बहुत आभार ।

JAMALUDDIN ANSARI के द्वारा
January 27, 2012

डॉ. मनोज रस्तोगी जी, नमस्कार , बहुत ही सार्थक रचना , आज के परिपेक्ष्य में यह रचना एक दम सही ,एवं सटीक है !

Ashok K. Vyas के द्वारा
January 26, 2012

डॉ. मनोज रस्तोगी जी, आपकी उत्कृष्ट लेखनी पर  मैंने बहुत दिनों पूर्व एक कमेण्ट दी थी…..पता नहीं, पोस्ट क्‍यों नहीं हुई …..धमकाने या लुभाने के दिन तो आधी सदी से भी पहले से आए हुए हैं….

roshni के द्वारा
January 25, 2012

आदरनिये मनोज जी चुनावी मौसम और हलचल की बहुत ही खूब सटीक और वास्तविक बयाँ कविता के रूप में पढ़कर अच्छा लगा .. आभार

sadhana thakur के द्वारा
January 25, 2012

सम्मानीय मनोज जी ,आज के हालात पर सटीक रचना ,बहुत अच्छी रचना ………….

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 25, 2012

    साधना जी , चुनावी मौसम में आपको गजल अच्‍छी लगी ,धन्‍यवाद ।

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
January 24, 2012

बहुत सुन्दर कविता.चुनावी मौसम का सुन्दर बखान.बधाई!

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 24, 2012

    राजीव जी, आपको रचना पसंद  आई, धन्‍यवाद । सराहना के लिए बहुत बहुत आभार

Bhawna के द्वारा
January 24, 2012

चुनावों की हकीकत

प्रवीण शुक्ल के द्वारा
January 23, 2012

चुनावों की हकीकत बयान करती आपकी ग़ज़ल .. आपको बधाई …..

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 23, 2012

    प्रवीण जी, प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार ।

Rakesh के द्वारा
January 23, 2012

बहुत अच्छा…. हमारे सैयां हैं, सरकार हमें पतियाने आयेहैन, पांच साल के बाद मुह दिखलाने आये हैं.

dineshaastik के द्वारा
January 20, 2012

कृपया इसे भी पढ़े– आयुर्वेदिक दिनेश के दोहे भाग-2 http://dineshaastik.jagranjunction.com/

yogi sarswat के द्वारा
January 19, 2012

नगरी नगरी द्वारे द्वारे आयेंगे अब नेता हमारे अब जहां कहो रुक जायेंगे फिर पांच बरस को छुप जायेंगे बहुत सुन्दर रस्तोगी साब ! धन्यवाद !

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 21, 2012

    योगी जी , काव्‍यात्‍मक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद । अफसोस है कि जनता यह जानते हुए भी फिर से उन्‍हीं नेताओं को चुन लेती है। rastogi.jagranjunction.com

Sumit के द्वारा
January 19, 2012

बहुत बढ़िया रचना ……… आखिर चुनावी दिन आ गए ….लोगो को जगाने के दिन आ गए http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/01/03/मैं-और-तू/

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 19, 2012

    सुमित जी , आपको गजल अच्‍छी लगी । बहुत बहुत धन्‍यवाद ।

tanya singh के द्वारा
January 19, 2012

kahan kho gaye wo log jo marte the desh par… aaj to bas desh bech kar muh chupane ke din aa gaye

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 19, 2012

    तान्‍या जी , सही कहा आपने । ये नेता तो इतने बेशर्म हैं कि हर चुनाव में सीना तान कर आ जाते हैं। जनता को इस बार समझदारी से अपने वोट का इस्‍तेमाल करना चाहिए। अगर उसे लगता है कि कोई भी प्रत्‍याशी इस योग्‍य नहीं है कि उसे वोट दिया जाए तो वह चुनाव नियम 1961 की धारा 49 – 0 के अधीन अपना ऐतराज दर्ज करा सकता है ।

मनोज वशिष्ठ के द्वारा
January 19, 2012

बढ़िया ़डॉक साब … सरल शब्दों में सियायत की मतलबपरस्ती और मौक़ापरस्ती पर अच्छा व्यंग्य है । बधाई ।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 19, 2012

    धन्‍यवाद मनोज जी ।  लिखने का प्रयास किया है। कुछ और शेर हुए हैं । जल्‍दी ही  उन्‍हें भी पोस्‍ट करूंगा ।

utsav deewana के द्वारा
January 18, 2012

sundar-saral shabdon mein, marmik aur saargarbhit vyang…! Do panktiyon ki gustakhi…safed vastron mein kaale karnamo ki kaalikh lapete aa gaye hain, chahron pe kutil muskaan ki rekhaon mein makkari samete aa gaye hain…hath jode aaswasan ki jugaali karne ke din aa gaye hain, janta bewakoof bandar nahi,magarmachchhon ko ye batane ke din aa gaye hain….

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 19, 2012

    बहुत सुंदर आपकी बेहतरीन पंक्तियों से आनंद आ गया । कम से कम जनता इस बार तो अक्‍ल से काम ले ।सही को चुने ।

January 18, 2012

मनोज जी इस सुंदर रचना में चुनावी सरगर्मी और उसके रूप रंग और बदलते तेवर के अलावा भी मुझे बहुत कुछ पसंद आया वो है आपका ग़ज़लकारी का नायाब अंदाज़…बहुत ही खूबसूरत ढंग से छोटे बह्र मे कही गयी ग़ज़ल …जनाब आपको बहुत बहुत मुबारकबाद !!! http://www.drsuryabali.jagranjunction.com

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 18, 2012

    भाई साहब , कहीं कहीं बहक गया हूं। प्रयास करके देखा है । ज्‍यादातर अतुकांत रचनाएं ही लिखी हैं।

Rahul Pandey के द्वारा
January 18, 2012

aap kavita suna rahe hain ya netao ko dhamka rahe hain, bechare maidan se bhag gaye to ham vote kise denge…

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 18, 2012

    राहुल जी ये बेशर्म चिकने घडे हैं । इन पर कविता का असर नहीं होगा ।

reshu के द्वारा
January 17, 2012

साधारण शब्दों में असाधारण रचना के लिए बधाई ……………..

dineshaastik के द्वारा
January 17, 2012

मनोज जी आप नेताओं का असली रूप दिखा गये, सचमुच ये वोटरों को जगाने के दिन आ गये, आपका आभार अच्छी रचना से हमारा परिचय करा गये, आप हमें और जनता को वोट की शक्ति बता गये,

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 17, 2012

    दिनेश जी , आपकी काव्‍यात्‍मक प्रतिक्रिया से मन प्रफुल्लित हो गया । काश जनता अपनी शक्ति को पहचान कर जाग जाए तो आपका हमारा प्रयास सार्थक हो जाएगा।

Santosh Kumar के द्वारा
January 16, 2012

आदरणीय डॉ. साहब ,.सादर नमन बहुत सुन्दर चिकोटी काटती रचना ,..कुछ दिन के हम सिकंदर !!…चार दिन की चांदनी है फिर तो अँधेरी रातें ही हैं जनता के हिस्से में ,..बहुत बधाई

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 17, 2012

    संतोष जी , इस समय तो जनता के हाथ में सब कुछ है——  जनता चाहे तो इस कहावत को ।  झुठलाने   के   दिन   आ  गए ।।

alkargupta1 के द्वारा
January 16, 2012

चुनावी चर्चा जगह-जगह अपना परचम लहरा रही है…. अति सुन्दर रचना डाक्टर साहब !

Naaz Barelvi के द्वारा
January 16, 2012

Nice.

ankit bajpai के द्वारा
January 16, 2012

गिरगिटों ने किया है धरती से चले जाने का ऐलान, जब नेता है यहाँ तो हमारा अब क्या काम .

aparna के द्वारा
January 16, 2012

bahut umda likha hain Manoj ji….sach hain…..girgidane ke din a gaye….

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 16, 2012

    बहुत बहुत आभार आपका ।  सही कहा आपने—– वोटो के भिखारियों के अब । गिडगिडाने के दिन आ गए।।

Rishi Bhargava Raj के द्वारा
January 15, 2012

बिलकुल सीधे और सरल शब्दों में ,,भारतीय जन मानस कि सामूहिक अभिव्यक्ति और मन में उमड़ते राजनैतिक नेताओं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आक्रोश को सही समय पर निकालने कि तर्कसंगत और यथार्थवादी विचारों को आपने सबके सामने परोसा है ……………सामाजिक चेतना के कारगर प्रयास के लिए आपको साधुवाद …डॉक्टर मनोज रस्तोगी जी …..

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 16, 2012

    राज जी, दूर देश  से मिली आपकी  प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूं। एक शेर और हाजिर है—— कुर्सी के भूखे इन नेताओं को । सुधारने  के  दिन  आ   गए।।

आर. एन. शाही के द्वारा
January 15, 2012

इसीलिये तो लोकतंत्र का महापर्व कहा गया है श्रद्धेय डाक्टर साहब ! किसी के लिये कुंभ स्नान है, तो किसी के लिये बहती गंगा में हाथ धोने का सुअवसर । कहीं तुरही बज रही है तो कहीं पिपिहिड़ी ! सड़ी हुई दही में भी चीनी की बोरी उंड़ेल कर मेले में सारा माल निकाल देना है, फ़िर कौन आता है हिसाब लेने, तब की तब देखेंगे । बधाई !

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 16, 2012

    भाई साहब, सादर नमस्‍ते । आपके आशीष से मैं भावविभोर हूं। समय समय पर मार्गदर्शन करते रहिएगा।

anandpravin के द्वारा
January 15, 2012

सर, लगता है सरकार को अब यही भाषा समझ में आएगी. अच्छी कविता के लिए बधाई.

Sushila Shivran के द्वारा
January 15, 2012

वाह मनोज जी ! क्या चुनाव पुराण लिखा है आपने ! आनन्द आ गया।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 16, 2012

    सुशीला जी ,भावाभिव्‍यक्ति के लिए आपका बहुत बहुत आभार ।

Divya shukla के द्वारा
January 15, 2012

मनोज  जी  बहुत  सुंदर  लिखा  आपने  …चुनाव  के  संदर्भ  में  इसी  पर  इक  गाना  याद  आ  गया  सलाम  कीजिये  आली  ज़नाब  आए  है  ये  पांच  सालों  का  देने  हिसाब  आये  हैं ……सुंदर  रचना  की  बधाई

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 16, 2012

    दिव्‍या जी , सही कहा आपने। पांच साल का हिसाव अब । चुकाने के दिन आ गए ।। प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 17, 2012

    हिसाव को हिसाब समझें ।


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