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देख कर उन्‍हें ये दिल जलता है

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चेहरे पर उनके तनाव झलकता है ।

मिला न उनको टिकट लगता है।।

पुराने कपडों की तरह फैंक दिया उनको ।
हर तरफ अब नया चेहरा दिखता है ।।

फिर से मांगने आ गए घर-घर भीख ।

देख कर उन्‍हें ये दिल जलता है ।।

लो शुरु हो गया है तमाशा उनका ।
देखते जाइए क्‍या गुल खिलता है ।।

डा. मनोज रस्‍तोगी

मुरादाबाद



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sushma Gupta के द्वारा
August 15, 2012

मनोज जी, आपकी अति लघु रचना नेताओं के प्रति समाज को एक सार्थक एवं गंभीर संदेश देने में पूर्ण सक्षम है| सुषमा गुप्ता

Sushma Gupta के द्वारा
August 15, 2012

मनोज जी, आपकी अति लघु रचना नेताओं के प्रति समाज को एक सार्थक एवं गंभीर संदेश देने में पूर्ण सक्षम है|                                                                                                             सुषमा गुप्ता

Santosh Kumar के द्वारा
January 11, 2012

आदरणीय डॉ .साहब ,..बहुत ही सुन्दर छोटी सी रचना ,..बहुत अच्छी लगी ,..सादर आभार

JAMALUDDIN ANSARI के द्वारा
January 8, 2012

डॉ. मनोज रस्तोगी जी नमस्कार आप की कविता वाकई बेहद ही उम्दा है, आज के नेताओं के पास स्वाभिमान नाम की कोई चीज नहीं रह गई है ये कब किस पल्ले पलट जाएँ कोई नहीं जानता ये जिस बर्तन में खाते है उसी बर्तन में छेड़ करते हैं. लेकिन पूरा दोष केवल उनका नहीं है उसमें आम जन की भी बराबर की भागीदारी है l सुनो प्यारे भारत वासी; भ्रष्टाचार है देश की थाती , नेता गण इसके है आदी; सबकी एक जैसी है माटी, जो जितना ही करे घोटाला ;वह देश का सबसे आला , जनता का है हाल निराला ; भ्रष्टों को पहनावे माला, अगर चाहते हो देश को सम्मान दिलाना, अपना -अपना उत्तरदायित्व निभाना,

anandpravin के द्वारा
January 7, 2012

डा. साहब, आपको मेरा प्रणाम, मैंने आपकी कविता “भोपाल गैस” वाली पढ़ी मैं आपकी शैली से काफी प्रभावित हूँ, आप व्यस्त व्यक्ति है, फिर भी आपसे याचना है की मेरे जैसे नए लेखकों का कुछ मार्गदर्शन करे I आपकी इस कविता की तो ज्यादा तारीफ़ नहीं करूंगा, क्यूंकि ये छनिक प्रतीत होती है, जो की चुनाव विशेष है I आपका नमन, आनंद प्रवीन

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    January 8, 2012

    आनंद जी, आप सबका स्‍नेह ही कुछ लिखने की प्रेरणा देता है। आपका बहुत बहुत आभार ।


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