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बारात या तमाशा ???

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अभी अभी एक शादी में शामिल होकर लौटा हूं । क्या बारात थी। बैंड बाजे की आवाज अभी तक जेहन में गूंज रही है, साथ ही नाचते हुए बारातियों के दृश्य भी। मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए पर बहु ठुमके लगा रही थी जेठ जी के साथ तो भावज भी कहां पीछे रहने वाली थी ,वह भी देवर जी के साथ शीला की जवानी पर कमर मटका रही थी। जीजा जी को भी आज मौका मिल ही गया और वह भी मस्ती भरे अंदाज में साली साहिबा को कभी हाथ पकड़ कर तो कभी कमर में हाथ डालकर नाचने के लिए खींचे चले जा रहे थे। दूल्हे राजा के दोस्तों का कहना ही क्या। उन्हें तो आज पूरी छूट थी। वे भी पूरे सुरूर में थे। बिल्‍लो रानी पर नाचते हुए सड़क पर लेट कर अपनी जान दिए जा रहे थे। सड़क के दोनों ओर राह चलते लोग भी खड़े होकर नाच को ऐसे देख रहे थे कि जैसे कोई शोभायात्रा हो। खैर बारातियों को इससे क्या मतलब। वे तो सजे धजे अपनी ही उमंग में थे। महिलाओं व युवतियों का पहनावा तो ऐसा था कि ठंड भी शरमा जाए। बारात आगे बढ़ती जा रही थी । हर कोई जोश में था। नाचने वालों कुछ नहीं होश था। नोट पर नोट उछाले जा रहे थे। बारात में अपने कंधों पर लाइटें उठाए चल रहे बच्चे उन लहराते हुए सड़क पर गिरते नोटों को टकटकी बांधे देख रहे थे। अचानक एक किशोर नोट लपकने के लिए बारात में घुस गया । यह देखकर एक बाराती का पारा चढ़ गया । बस फिर क्या था ,उस बेचारे की शामत आ गई। सड़क पर पड़ा नोट उठाने के चक्कर में उसकी लातों से पिटाई हो गई। जैसे-तैसे बारात रेंगती हुई बैंक्वेट हाल पहुंची। नाचते दोस्तों और रिश्तेदारों को बमुश्किल समझा-बुझा दूल्हे को घोड़ी से उतारा गया।
उधर खाने पर घरातियों व बारातियों की भीड़ टूटी पड़ी थी। तरह-तरह के लजीज व्यंजनों से उनकी प्लेट भरी हुई थी । पेट तो आखिर पेट है,कितना खाया जायेगा। नतीजा यह हुआ कि जितना खाया गया उतना खाया बाकी प्लेट में छोड़ दिया। अभी यह सिलसिला चल ही रहा था कि जयमाल के दौरान दूल्हे के कुछ दोस्तों ने दुल्हन की सहेलियों पर कुछ भद्दा कमेंट कर दिया। यह कुछ घरातियों को नागवार गुजरा और शुरू हो गया दोनों पक्षों में युद्ध। खैर बड़े-बूढ़ों ने बीच बचाव कर मामला निपटाया। रात का एक बज चुका था। सुबह बच्चों को स्कूल भी जाना था सो हम तो अपने घर आ गए लेकिन रातभर दिमाग में सवाल कौंधते रहे कि शादी में यह सब होना जरूरी है- महिलाओं व युवतियों का सड़क पर नाचना, नोटों का उछालना,पैग लगाकर हुड़दंग मचाना, प्लेट में जूठन छोडऩा , युवतियों पर भद्दे कमेंट करना।



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38 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Gitanjaly के द्वारा
December 14, 2011

नमस्कार भाई आपने सही ही लिखा है. मै भी इस तरह के भद्दे प्रदर्शनों के विरोध में ही हूँ. हमे समझना होगा की दायरे और आधुनिकता में जो अंतर है वही अंतर उत्सव और प्रदर्शन में भी है. किसी भी विवाह के मूल उद्देश्य से बारात अक्सर सो हाथ दूर ही रहती है. इस प्रकार के भोंडेपन को आधुनिकता समझने वाले लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते की इस सब में सभ्यता तार तार हो जाती है. अक्सर विवाह के समय सबसे प्रमुख फेरो को नजर अंदाज़ कर दिया जाता है. बाराती नाचने में अधिक समय व्यतीत करते हैं और मुख्या विवाह संस्कार के समय जल्दी मचाते हैं.

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 15, 2011

    समर्थन के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद गीतांजलि जी। आपने सही लिखा है । यही कहा जाता है कि पंडित जी जरा जल्‍दी वाले फेरे करवाइएगा ।

roshni के द्वारा
December 8, 2011

मनोज रस्तोगी जी नमस्कार , जितनी अनाज ,बिजली , पैसे की बर्बादी शादियों मे होती है उतनी कही नहीं …न जाने क्यों लोग इतनी बर्बादी मे अपनी शान समझाते है .. सादी शादी करके वोह ये सब कुछ बचा सकते है .. यही नहीं अक्सर शादियों मे रिश्तों मे भी खटास पैदा हो जाती है मगर हम लोग तो तमाशे मे ही जीते है इसलिए सही सरल और सबके लिए ठीक राह चुनने की बजाये तड़क बड़क और सब ऊपर लिखती हरकते करते है .. एक अच्छे लेख आभार

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 8, 2011

    रोशनी जी , आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद। शादी समारोह आजकल स्‍टेटस सिंबल बनता जा रहा है। इस प्रतिस्‍पर्धा में समाज का मध्‍यम वर्ग हीन भावना व कुंठा का भी शिकार हो रहा है। यही नहीं बढते भ्रष्‍टाचार का एक कारण भी यह है। 

rishiraj rahi के द्वारा
December 8, 2011

बहूत अचछा

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 8, 2011

    भाई साहब, उत्‍साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत आभार ।

    Divya shukla के द्वारा
    December 11, 2011

     फजूलखर्ची  और  दिखावेबाजी  पर  आप  का  ये  लेख  एक  अच्छा  सन्देश  है  …बधाई  आपको

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 15, 2011

    दिव्‍या जी, बहुत बहुत धन्‍यवाद ।

rashmi sharma के द्वारा
December 6, 2011

ये तो अब परंपरा का हि‍स्‍सा बन गया है। आप चाह कर भी नहीं बदल सकते। एक दर्शक के रूप में यह बुरा या मर्यादाहीन कृत्‍य लग सकता है मगर जि‍सके घर में उत्‍सव हो रहा हो उन्‍हें यह कतई बुरा नहीं लगता बल्‍कि‍ यह नहीं होने से समारोह फीका लगता है। हालांकि‍ यह सब शालीनता के दायरे में हो तो स्‍वस्‍थ मनोरंजन होता है। इसे हम यूं ही नहीं रोक सकते। इसके लि‍ए पूरा सामाजि‍क ढांचा बदलना होगा और प्रर्दशन की चाहत पर अंकुश लगाने से ही संभव है। मगर व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर मेरा मानना है कि‍ इसमें काफी वक्‍त लगेगा।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 7, 2011

    रश्मि जी ,मेरा मानना है कि महिलाएं व युवतियां सडकों पर न नाचें । घर में या बैक्‍वेट हाल में डीजे पर जितना चाहें नाचें। ि‍फर भी शालीनता का दायरा तो होना ही चाहिए।

Amar Singh के द्वारा
December 1, 2011

यह यहाँ का एक दुखांत है की इस प्राकर के तमाशे अक्सर यहाँ होते रहते है, दुर्घटनाये भी होती है, बयिजत्ति भी होती है लेकिन लोग फिर भी नहीं समझते. http://singh.jagranjunction.com

Sangya के द्वारा
November 29, 2011

Adarniy Rastogiji, kuchh aise log samaj ka abhinna ang rahe hain aur rahenge… inhe sudhaarna kisi ke bas ki baat nahin hai. Mere vichar se, inpar jyada dhyan na dene me hi mansik santosh hai. Baat jyada bigdne par jarur tagda virodh hona chahiye.

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 29, 2011

    संज्ञा जी, विरोध तो करना ही पडेगा । जख्‍म का सही समय पर उपचार नहीं किया गया तो वह नासूर बन जाता है।

vibhav srivastava के द्वारा
November 28, 2011

Manoj ji….meri samjh me baraat…..tamasha bhi hai…..aur parampara bhi…..tamasha isliye……kyoki…..ise dekh kr sbka manoranjan hota hai…….aise aise dance dekhne ko milte hai jo shayd hi kahi aur mile…….. kbhi kbhi to band ki awaz bhi dhang se sunai nhi deti……pr log generator ki awaz pr bhi thumke lagate nazar aate hai………..aur kyuki ye sadiyo se hota aa rha hai…….isliye ye 1 parampara si ban gai hai……..aur ye parampara dheere dheere aur bigadti ja rhi hai…….jiske bare me aapne apne blog me likha hai………

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 28, 2011

    सही कहा आपने श्रीवास्‍तव जी। इस बिगडती परंपरा को रोकने का कोई उपाय होगा। कभी कभी तो शालीनता की सारी हदें पार हो जाती हैं। यह सब  सडकों पर सार्वजनिक रूप से होता है और राह चलते लोग……….. ।

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 27, 2011

आदरणीय मनोज जी …..सादर अभिवादन ! आपकी इस बरात ने ठण्ड को किसी हद तक कम तो किया लेकिन दो बातों की कमी भी खली *आपने जलेबी बाई का जिक्र तो किया ही नहीं *फेरो के वक्त कितना चढ़ावा सबके सामने दिया गया ? खैर कोई बात नहीं बाद में मूवी देख कर बता दीजियेगा ….. जय श्री राम :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 28, 2011

    आपकी यह इच्‍छा भी पूरी होगी लेकिन मेरे सवाल अभी यथावत हैं।

अशोक कुमार व्यास के द्वारा
November 27, 2011

ये तमाशे अब परम्परा का रूप ले चुके हैं। इनको हम आसानी से रोक नहीं सकते क्योंकि ये जन-आन्दोलन की परिधि में लाने जितने महत्वपूर्ण भी नहीं हैं……हम बस इतना कर सकते हैं कि हमारे घर-परिवार का कोई आयोजन, इस तरह के तमाशे का रूप ना ले ।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 28, 2011

     अशोक जी , मेरी भी यही अपेक्षा है कि हमारे घर-परिवार का कोई आयोजन, इस तरह के तमाशे का रूप ना ले । 

vijaya mishra के द्वारा
November 27, 2011

यह कड़वा सच है कि आज शादी मय दिखावा होता है ..आज तो सिर्फ तमाशा ही होता है ..लड़के वालो कि अकड ..शराब के बिना शादी नहीं ,,उस पर औरतो पर भद्दे कमेंट्स …क्या कहे … आप सही कहते है पर इस तरह परेशान तो पुरुष ही करता है उसे इस तरह नहीं करना चाहिए .वह यह करते वक्त यह नहीं सोचता कि उस कि भी बीवी या बहन या बेटी भी किसी कि शादी में जाती है उन के साथ किया तो ..

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 28, 2011

    विजया जी,  हमें इसी मानसिकता को बदलना  होगा चाहे वह पुरुष अपना ही क्‍यों न हो। शादी की खुशी में यह छूट तो  नहीं होनी चाहिए। मर्यादाओं  और रिश्‍तों का तो ध्‍यान रखना ही चाहिए।

allrounder के द्वारा
November 26, 2011

मनोज जी, सादर नमस्कार शादी विवाह हमारे देश मैं सदियों से हर्षौल्लास से मनाये जाते रहे हैं, किन्तु सादगीपूर्ण हर्षौल्लास का स्थान आजकल हुडदंग ने ले लिया है! और अब तो कई स्थानों पर इस हुडदंग ने जानलेवा रूप धारण कर लिया है, जहाँ हर्ष फाइरिंग के नाम पर खुले आम जायज और नाजायज अस्त्रों का प्रयोग किया जाता है वह भी नशे के वशीभूत होकर, जिससे कई बार निर्दोषों को इसकी कीमत अपनी जान से चुकानी पड़ती है ! फिर भी दोस्त की शादी है हुडदंग तो होगा ही … ???

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 27, 2011

    सही कहा आपने । आज ही एक खबर आई कि बहजोई ( जनपद भीमनगर) में दस दिन पूर्व एक शादी समारोह में हर्ष फायरिंग में गोली लगने से घायल कपडा व्‍यापारी व समाजसेवी की आज नोएडा के एक अस्‍पताल में उपचार के दौरान मौत हो गई ।

वन्दना के द्वारा
November 26, 2011

बात तो गलत है मगर आज लोगो ने इसे रिवाज़ बना लिया है और उसी का खामियाज़ा भी फिर उन्हे ही भुगतना पडता है।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 26, 2011

    धन्‍यवाद ,वंदना जी। कम से कम हमें अपनी मर्यादा  और रिश्‍तों का तो ध्‍यान रखना ही चाहिए।

rajkumar yadaw के द्वारा
November 26, 2011

आजकल शादीय़ो में दिखावा बहुत  हो रहा है लोग़ दहेज लेकर शादी कर रहे हैं जिसको भी अपनी शान  दिखानी है अपने बल पर दिखाना चाहिए न कि लड़की वालों से पैसे लेकर - और ऐसा करना चाहिए कि शादी में  किसी भी प्रकार का दुसरों को दुःख न हो जिसको भी दिखावा करना है अपने बल पर घर पर करना चाहीए और  शादी मे तो शराब एकदम न तो पीना चाहिए न पिलाना चाहिए न तो पीने देना चाहीए बहुत से लोगो को देखा हुँ घर पर खाने के लिए ठीक से नही मिलता है लेकिन शादी में खाने के लिए कई तरह के नाटक करते हैं और  बाराती होने का भी मतलब य़ह नही होता है। कि दुसरे के बहु बेंटीय़ों के साथ गंदी हरकत करें और दुसरों को भी करने से रोकना चाहीए। दहेज तो। न लेना चाहीए न देना चाहीए दहेज को समाज में बुराई के तरह देखना  चाहीए मेरे पिताजी ने हम पाँच भाईयों की शादी किए परंतु एक भी शादी मे एक भी पैसा नहीं लिए दहेज नही लेकर समाज मे एक उदाहरण  बनना चाहीए

    नीरज सैनी के द्वारा
    November 26, 2011

    ये एक सचाई है की शादियों में आजकल हुडदंग बहुत होने लगा है ये हमारे समाज को खराब करने का सबसे बड़ा कारन है, और हुडदंग होता क्यों है ये होता है दिखावे के कारन लोग पैसे के कारन पागल हो चुके है और शराब पीकर शेर बन जाते है ये नहीं सोचते की आपका व्यवाहर सबको कैसा लगेगा, कल आपके यंहा भी शादी होगी कोई आपके यंहा आंके आलती सीधी हरकते करे तो आप को अच्छा लगेगा, सोचना चाहिए एसे लोगो को.

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 27, 2011

    यादव जी , ठीक कहा आपने । बारात में महिलाओं का नाचना उचित नहीं है।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 27, 2011

    नीरज जी ,बारात में यह सब  अशोभनीय है। इसका घर के बुजुर्गो को विरोध करना चाहिए।

vivek sharma के द्वारा
November 26, 2011

अच्छा लिखा है आपने , ये सब एक फैशन बन गया है आज कल की शादियों का कही कही तो मई देखता हूँ की छमता से ज्यादा मेहमानों को इनविटे किया जाता है और बाद में अव्यवस्था बनी रहती है. मेरे विचार से शादियों में बारातियों की संख्या भी लिमिटेड होनी चहिये ताकि कम लोग होंगे तो लोग एक दुसरे को अछे से जान पायंगे

alka के द्वारा
November 25, 2011

बहुत सजीव चित्रण  इस पर और भी बहुत कुछ लिखने आग्रह करती हूँ मनोज जी आपसे जो विवाह कि व्यवस्थाए और तरीके हो रहे हैं उन पर कृपया

prof.Bharati M Sanap,Head of Hindi Department,Government Arts&Science College,Aurangabad,Maharashtra. के द्वारा
November 25, 2011

शादी ब्याह एक सांस्कृतिक पहलु हैं ,इसमे सभ्यता का होना अनिवार्य हैं .यही भारतीय नीतिकता की पहचान हैं .लोग अतिरिक्त साधन सम्पन्नता के कारण संस्कार भूल गए हैं ,यह शोचनीय बात हैं .भविष्य की पीढ़ी के लिए कौनसे संस्कार देने हैं ,इसकी किसी को मनुष्य होने के नाते परवाह नहीं हैं .डॉ. मनोज तिवारी जी आपने बड़े अहम और संवेदनशील घटना का जीवंत एवं वास्तव पूर्ण चित्र उपस्थित किया ,आपको बहुत धन्यवाद् .

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 25, 2011

    भारती जी,  आपका बहुत बहुत आभार । घर संस्‍कारों की प्रथम पाठशाला है। शुरुआत हमें अपने घर से ही करनी चाहिए। बच्‍चें को संस्‍कारित करने में मां  का महत्‍वपूर्ण योगदान होता है लेकिन क्‍या करें आजकल की मां भी ………….. । पिता जी को फुरसत ही नहीं है ।

nishamittal के द्वारा
November 25, 2011

डॉ साहब पूर्णतया सजीव चित्रण वस्तु स्थिति का प्रस्तुत किया है आपने.

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 25, 2011

    निशा जी, कोशिश की है देखिए कहां तक सफल होता हूं।  अपनी लेखनी से भी इस विषय को आगे बढाएं।


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