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कल्कि महोत्‍सव या कलियुग महोत्‍सव ???

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राधे राधे रटो चले आयेंगे बिहारी , श्री राधे राधे राधे बरसाने वाली राधे ,रात श्‍याम सपने में आये भजनों की जगह अगर स्‍वर गूंजें मुन्‍नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए ,पल पल न माने टिंकू जिया,शीला की जवानी,दम मारो दम मिट जाये गम ,इश्‍क का मंजन घिसे और इन पर आइटम गर्ल्‍स अपने लटके झटके दिखा कर जलवे बिखेरें तो इसे आप क्‍या कहेंगे । जी हां यह सब कुछ पिछले दिनों यहां सम्‍भल में कल्कि पीठाधीश्‍वर के संयोजन में हुए कल्कि महोत्‍सव में देखने को मिला। सम्‍भल के ऐंचोडाकम्‍बोह स्थित श्री कल्कि धाम में पिछले कई साल से कल्कि महोत्‍सव का
आयोजन किया जा रहा है इस बार भी यह आयोजन किया गया । इस आयोजन में भ्रष्‍टाचार के खात्‍मे को महायज्ञ का आयोजन किया गया। गंगा को निर्मल बनाने के लिए गंभीर चर्चा की गयी। आयोजन में अनेक धर्मगुरूओं के अलावा गोवा के मुख्‍यमंत्री दिगंबर कामथ सपत्‍नीक , मध्‍यप्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह ,कांग्रेस सांसद राज बब्‍बर,केंद्रीय कोयला मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल ,संसदीय कार्यमंत्री हरीश रावत, कर्षि राज्‍यमंत्री चरण दास महंत, ग्रामीण विकास मंत्री प्रदीप जैन आदित्‍य भी शामिल हुए।
रात को सांस्‍कतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया । पहले दिन मुंबई से आये सूफी गायक रामशंकर,प्रेमप्रकाश दुबे,कणिका आदि ने भक्ति गीत प्रस्‍तुत किए तो दूसरे दिन क्रिस्‍टल डांस ग्रुप मुंबई की आइटम डांसर सुनीता मुखर्जी ने अपने जलवे बिखेरे । तीसरे दिन रात को मंच पर थीं आइटम गर्ल शैफाली जरीवाला। कांटा लगा , मुन्‍नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए ,पल पल न माने टिंकू जिया,शीला की जवानी,दम मारो दम मिट जाये गम ,इश्‍क का मंजन घिसे जैसे गानों की प्रस्‍तुति और इन पर पश्चिमी पहनावे के कपडों में आइटम गर्ल्‍स ने दिखाए अपने लटके झटके । सुबह आध्‍यात्‍म और रात को ???
संत, राजनेता और आइटम गर्ल्‍स क्‍या अदुभुत संगम था इस महोत्‍सव में । अब इसे कल्कि महोत्‍सव कहें या कलियुग महोत्‍सव , अपनी तो समझ से परे है। महोत्‍सव में शामिल साधु संतो का कहना है कि यह कोई चिंतन का विषय ही नहीं है कौन किस नजरिए से उसे देखता है यह उसकी भावनाओं पर निर्भर करता है। शैफाली जरीवाला कहती हैं – मैं ऐसा नहीं मानती हूं कि नए गीतों में कोई अश्‍लीलता है, क्‍योंकि यह तो देखने वाले के नजरिए पर निर्भर है।
आपका क्‍या कहना है जरूर बताएं।
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68 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
November 1, 2014

इस साल भी  यही हो रहा है ,

vivek sharma के द्वारा
December 2, 2011

दरअसल इन श्रीमान जी का कर्यछेत्र गाजियाबाद के आस पास रहा है इसलिए इनके बारे में विस्तृत जानकारी मुरादाबाद के आस पास के लोगो को नही है

vivek sharma के द्वारा
November 27, 2011

सही पहचाना अपने डॉ साहब. वैसे ये तो सर्व विदित है की ये श्रीमान कृष्णं किसी समय एक कर्मठ कांग्रीस्य हुआ करते थे राहजनी से लेकर चरस अफीम की तस्करी इनके पुराने क्रिया कलाप रहे हैं. श्रीमान जी के दिल की तमन्ना MLA बनकर जनता की सेवा करना थी पर कांग्रेस तो क्या किसी भी पार्टी से टिकेट नही मिला. दिमाग में कीड़ा पुराना है कुलबुलाना तो था ही नतीजा आज आप देख ही रहे है. कभी केवल ४ मठ हुआ करते थे परन्तु १० – १२ मठाधीस तो इसी महोत्सव में सिरकत करते है अब कैसी वो मठ है और कैसे मठाधीस इश्वर ही जाने . वैसे जहा तक है हमारे देश में लगभग ६ लाख ग्राम है और ४८ लाख क करीब साधू संत. औसतन ८ साधू एक ग्राम पर आते है. अब अगर ८ साधू अपने मूल कर्तव्य समाज सुधर पर लग जाये तो हर ग्राम एक आदर्श ग्राम में बदल जाये पर वास्तव में तो ये साधू नामक जंतु हरिद्वार और ऋषिकेश में फ्री की खाते हैं और मौज उड़ाते हैं

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 2, 2011

    इतनी तो जानकारी है कि कांग्रेस से इनका कभी नाता रहा था । शायद इसीलिए इनके कार्यक्रमों में ज्‍यादातर कांग्रेसी ही आते हैं।

मोहित कुमार राजपूत के द्वारा
November 27, 2011

जो कुछ भी हुआ, गलत हुआ, पर इसका आशय ये नही लगाना चाहिए की साधु संत पथभ्रष्ट हो गये है.

    vivek sharma के द्वारा
    November 27, 2011

    भैय्या जी ये लोग पथभ्रष्ट नही हुए हैं पथ ही अपने आप में भ्रष्ट हो गया है

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 2, 2011

    मोहित जी, मैने तो एक तस्‍वीर दिखाई है। फैसला तो आपको करना है।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 2, 2011

    विवेक जी , धन्‍यवाद ।

Raghuvir Chauhan के द्वारा
November 25, 2011

डा. साहब, कलियुग में यह सब होना कोई आश्चर्य की बात नहीं। रोग हुआ तो दवा की भी खोज हुई। पाप बढ़ेंगे तो उनका नाश करने को अवतार भी होगा। ऐसे कृत्यों से विचलित होने की ज़रूरत नहीं है।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 25, 2011

    शायद इसीलिए इस महोत्‍सव में ऐसा आयोजन किया गया।

    deepak kumar के द्वारा
    December 16, 2011

    सही कहा 

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 17, 2011

    धन्‍यवाद दीपक जी ।

prof.Bharati M Sanap,Head of Hindi Department,Government Arts&Science College,Aurangabad,Maharashtra. के द्वारा
November 24, 2011

नमस्कार! मै १० से १२ जनवरी २०१२ में देल्ही में होने जा रहे वैश्विक हिंदी सम्मेलन में सहभागी होना चाहती हूँ | मेरे साथ मेरे रिश्तेदार कुल पाँच सदस्य होंगे | उनमे एक मेरी बहन प्रोफेसर संज्योती सानप हिंदी विभागप्रमुख,elphinstone कॉलेज मुंबई से हैं |कृपया आपसे विनती हैं कि हम सभी सदस्यों को सम्मलेन में सहभागी होने का अवसर मिले |हमारे कॉलेज के पते पर हमारे और प्राचार्य के नाम पर निमंत्रण पत्र भेजे क्योंकि हम गवर्नमेंट कॉलेज में प्रोफेसर हैं |कुछ अधिक जानकारी चाहिए तो मेरा मोबईल नंबर हैं ~९३२५५२३७७७.धन्यवाद …आपकी सुचना कि प्रतीक्षा में |

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 25, 2011

    ……………………?????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????

Santosh Kumar के द्वारा
November 24, 2011

वाह कलियुगी संतों ,..तुम्हारा बंटाधार हो !…धर्म का बंटाधार तो कर ही चुके हो ….

ankit bajpai के द्वारा
November 23, 2011

कल्कि महोत्सव मेँ भगवान श्रीहरि के अवतार की प्रतीक्षा करते हुए उनका भजन-कीर्तन, सत्संग-प्रवचन और चिँतन-मनन करना चाहिए… विपरीत इसके कल्कि-सभाओँ मेँ कैसा कलियुगी नंगा नाँच हो रहा हैँ? ये सर्वविदित है..

मुकेश भारतीय के द्वारा
November 23, 2011

यह न कल्कि महोत्सव है और न ही इसे कलियुग महोत्सव की संज्ञा ही दी जा सकती है, बल्कि एक सामाजिक व धार्मिक तौर पर ” अपराधिक महोत्सव” है।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 23, 2011

    धन्‍यवाद मुकेश जी, बहुत बहुत आभार आपका । सही कहा आपने यह आयोजन धार्मिक अपराध की ही श्रेणी में आता है।

Shrikant Akela...H.P. के द्वारा
November 22, 2011

Rastogi ji….Yah dekhkar Lagta Hai Ki Aaj Hamare samaj Hamari Sanskriti Par Triangular Daka Dala Ja Raha Hai….Tathakathit Mahatma +Sanskriti Ke Saste Thekedaar+Aur Kamook Raajneta….Ye Hamain Jo paroste Hain Hum Use Sweekar Karke Maje Lete Hain Aur Sari Maryadayein Bhoolkar Hum Inki Jebein Bhrte Hain…..Budijivibarg Bhee Tathakathit ki shreni main aane ko aatur hai,Virodh kare to koun ?…………….Yaani Hum Ganje Bhee Ho RAhe Hain Aur Khud Taali Bhee Baja Rahe Hain……………..Issi Baat Ka Rona Hai.

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 23, 2011

    किसी को इसके खिलाफ आवाज तो उठानी ही होगी । इसकी शुरुआत हम अपने घर से ही करें । अपने बच्‍चों को इससे बचाएं। धर्म के नाम पर हो रहे इस तरह के आयोजनों का विरोध करें। एक – एक करके ही अनेक हो सकते हैं।

Divyendra के द्वारा
November 22, 2011

simply saying… its a shame….

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 23, 2011

    धन्‍यवाद , दिव्‍येंद्र जी।  मुहिम में साथ देने के लिए।

वाहिद काशीवासी के द्वारा
November 22, 2011

डॉ. साहब, मैंने टीवी पर भी इस आशय का समाचार देखा था। बड़े ही सामान्य और संतुष्ट भाव से संत महोदय उद्धृत कर रहे थे कि शेफाली जरीवाला अपने अंदाज़ में भगवान के प्रति अपना भक्ति भाव प्रदर्शित कर रही हैं इस पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है मगर उनसे ये पूछा जाना चाहिए था कि अपना ये उन्मत्त भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिए कितना भुगतान किया गया था। कल्कि महोत्सव सुबह आध्यात्म से सराबोर था तो रात को काम से। ऐसे तर्क प्रस्तुत करके उन तथाकथित संत महोदय का कौन सा अभिप्राय सिद्ध हो रहा था ये जानना मुश्किल नहीं है। आज तो सबकुछ हाईटेक है और एडवांस्ड भी।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 23, 2011

    भाई साहब , ऐसे तथाकथित संतों  का क्‍या किया जाए। ऐसे आयोजनों की भर्त्‍सना करके अन्‍य संगठनों को सचेत तो करना ही पडेगा ताकि भविष्‍य में ऐसा न हो । विचार व्‍यक्‍त करने और मेंरा साथ देने के लिए बहुत बहुत आभार ।

Baijnath Pandey के द्वारा
November 22, 2011

आदरणीय श्री रस्तोगी जी, सादर अभिवादन दरअसल कल्कि महोत्सव कलयुग में किया जाने वाला ऐसा महोत्सव बनकर उभर रहा है जो भगवन कल्कि को अवतार ग्रहण करने की प्रेरणा दे रहा है, इसलिए इसे जो भी कहिये गलत नहीं होगा | यह अजब संयोग है की कुछ हीं दिनों पूर्व मै विष्णु पुराण में कलयुग के वर्णन वाला भाग पढ़ रहा था | वैसे तो कलयुग के बारे में अधिकांश भारतीय ग्रंथों में कुछ न कुछ जरूर लिखा गया है और धीरे-धीरे उन महान ऋषियों की लिखी हुई सारी बातें सच साबित हो रही है | मसलन, पाखंडी लोग सन्यासी अथवा विद्वान् का वेश धारण कर सम्मानित हो रहे हैं | प्रजा कर के माध्यम से प्रजा का धन हड़प रही है | धर्मात्मा पुरुषों के द्वारा शुरू किये गए कार्य अपूर्ण रह जाते हैं इत्यादि इत्यादि |……… गौरतलब बात ये है इन बातों (अश्लीलता एवं भ्रष्टाचार) को अपने अपने जीने का ढंग कह कर महिमामंडित किया जाता है | मेरा कहना है कि अगर नाच का कार्यक्रम हीं रखना है तो इसके लिए वैदिक पाखंड क्यूँ ? शीला कि जवानी दिखने के लिए भगवान् कल्कि के नाम का उपयोग क्यूँ? ऐसे आयोजन से तो अच्छा है बिग बॉस कार्यक्रम, जिसके नाम से हीं ……… एवं मानसिक हीनता कि झलक मिल जाती है | कम से कम देखने वालों को पता तो होता है कि वे क्या देख रहे हैं | वस्तुतः, ये रंगे सियार (राजनेता, फिल्मकार, मिडिया) हीं हमारे देश के अस्तित्व को खा रहे है | ये हमें बता रहे हैं कि मोडर्न वो है जो अश्लील कपडे पहने, धोखाधड़ी करे, और बिना जरूरत के अंग्रेजी बोले | ये लोंगो को ये क्यूँ नहीं बताते कि देश में कई वर्षों से ढंग का कोई वैज्ञानिक नहीं पैदा हुआ क्यों कि हम विदेशियों द्वारा खोजे गए बातों को केवल रटते हैं, हमने स्वयं सोंचने कि क्षमता खो दी है | वे यह क्यूँ नहीं बताते कि sunny Leon को स्वयं उनके देश में कितनी इज्जत मिलती है ( पैसे को छोडिये, पैसा तो सोनिया जी के भी पास है ), ये इस बात को क्यूँ नहीं बताते कि सारे विकसित देशों में अपनी भाषा का हीं प्रचलन है |………… कहने को बहुत कुछ है अगर कहा जाय | संक्षेप में यही कहूँगा कि आपने जो रंगीन झांकी प्रस्तुत कि है वास्तव में वह भारतवर्ष के पतन का नमूना मात्र है …….sachchaai और भी भयावह है | बहुत-२ आभार आपका इस विशिष्ट आलेख के लिए |

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 23, 2011

    पांडे जी , आप सही कह रहे हैं कि ये रंगे सियार (राजनेता, फिल्मकार, मीडिया) हीं हमारे देश की संस्‍कृति को नष्‍ट करने पर तुले हुए हैं। अफसोस तो यह है कि तथाकथित संत भी इसमें शामिल हो गए।

nishamittal के द्वारा
November 22, 2011

आदरनीय डॉ साहब आपने सचित्र विवरण प्रस्तुत कर कोई गुंजायश नहीं छोडी कार्यक्रम की स्तरहीन प्रस्तुति और ऐसे संत कम सत्तालोलुप और चरित्र विहीन नेताओं के मुखौटे दिखाने में.

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 23, 2011

    धन्‍यवाद निशा जी,आभारी हुं आपकी प्रतिक्रिया का। क्‍या ऐसे संतों और नेताओं का विरोध नहीं होना चाहिए। इसके लिए क्‍या रास्‍ता अपनाया जाए।

aneeta rastogi के द्वारा
November 22, 2011

Aneeta Rastogi –  Morals ka Tootna Aur unhe bachane ki Koshish….Ye sangharsh humesha se chalta aaya hai aur chalta rahega…!!!Jo bhi “sachet”ho use apna “dharm” nibhana chahiye, fir chahe aam admi ke prati sant kare ya sant ke prati aam admi…..isliye aao KALAM ki taakat aur MEDIA ki shakti ko kaam me laayen….ek ek ka pryas bhi FARQ layega…

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 22, 2011

    बहुत बहुत धन्‍यवाद। आपका आहृवान जरूर रंग लायेगा। समाज में यदि कुछ अनुचित हो रहा है तो उसका विरोध तो जताना ही चाहिए। मौन साधने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए आगे आना ही होगा ।

Rishi Bhargava Raj के द्वारा
November 21, 2011

रसतॊगी जी आज देश  मे सूचना क्राित ने मानस पटल कॊ इतना प्रभािवत  िकया है  िक कॊई भी इसके मॊह से बच नही पाया है,चाहे वॊ नेता हॊ या अभिनेता, साधु हॊ या सनयासी,कवि हॊ या शायर हर कॊई अपने आप कॊ अधिक से अधिक प्रचारित करना चाहता है चाहे वॊ सामाजिक,धार्मिक या नैतिक मूलयॊं कॊ दॉंव पर लगाके ही कयॊं ना सभंव हॊ। जिनके हाथ मे हमारे सनातन धरम की परंपरा कॊ आगे बढाने का दायितव है वॊ ही भौतिकता की चकाचौंध में ऐसे चुधंयाये है कि उनहे उचित या अनुचित पर विचार करना पसंद ही नही है। जब धरम के प्रतीक माने जाने वाले साधु सनयासी फूहडता और अशशीलता कॊ आँख मूँदकर सवीकार करेंगे तॊ साधारण मानव से कया अपेक्षा की जा सकती है। ये बहुत ही गभींर और विचारणीय मुददा है जिसपर विदवान और सजग लौगॊं को चिंतन मनन करके चाहे कठॊर परंतु उचित निरणय लेना चाहिए ।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 21, 2011

    राज जी, इस मुद़्दे पर विचार व्‍यक्‍त करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार । विदेश में रहते हुए  आप अपने देश की संस्कृति के प्रति गंभीर हैं। मूल्‍यों के होते जा रहे इस पतन को लेकर हमें सचेत होना ही पडेगा। आपने सही कहा कि जब साधु संन्‍यासी ही फूहडता और अश्‍लीलता कॊ आँख मूँदकर स्‍वीकार करेंगे तॊ साधारण मानव से क्‍या अपेक्षा की जा सकती है। 

Ompal Singh के द्वारा
November 21, 2011

Agar Lateke_ Jhatke Hee Dekhane the to yagya Hee kyun Karaya.

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 21, 2011

    सही कहा आपने। यह तो आचार्य श्री का संत, राजनेता और आइटम गर्ल्‍स का संगम था ।

Dr.Anita Kapoor के द्वारा
November 20, 2011

हमारे विचार में यह जो हुआ गलत है…सिर्फ यह कह देने भर से कि…” अपना अपना देखने का नजरिया है” ….से आप कोई भी गलत काम करने का लाइसेंस नहीं पा जाते…..हरेक क्षेत्र व् संस्कृति और कला की भी अपनी एक मर्यादा होती है…..जो समाज को संतुलीत बने रहने में सहायक होती है…..यह जो भी हुआ है ….गलत है…सिर्फ भीड़ जुटाना और सस्ती पब्लिसिटी की भूख …..सही दिशा से भटका देती हैं……और गलत को सही साबित करने में दिशाहीन हो रहा है समाज

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 21, 2011

    आपके विचार से मैं सहमत हूं। हमें मर्यादा का तो पालन करना ही होगा । यही कार्यक्रम किसी गैर धार्मिक संस्‍था की ओर से किसी और अवसर पर कहीं और होता तो हम कह सकते थे कि अपना अपना देखने का नजरिया है । वहां तो भक्ति भाव ही होना चाहिए।

वन्दना के द्वारा
November 20, 2011

बेहूदगी की हद है…..ऐसे संतों ने हमारी संस्कृति को बदनाम किया हुआ है।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 20, 2011

    धन्‍यवाद ,वंदना जी । कम से कम  इन पीठाधीश्‍वरों से तो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती ।

Dr.Danda Lakhnavi के द्वारा
November 20, 2011

कलयुग :::: मशीनों का युग =============== समाज मे एक आम धारणा प्रचलित है कि कलयुग मानवीय चरित्र के पतन का युग हैं। यह युग में मशीनों की बहुतायत है। कलयुग का एक अर्थ कलपुर्जों अर्थात मशीनों का युग है। इसलिए भी यह युग कलयुग कहलाता है। क्या इस युग सब बुराइयाँ ही बुराइयाँ है…..अच्छाइयाँ है ही नहीं? ऐसा नहीं है। मानवीय कमजोरियाँ हर युग में रही हैं। आज समाज में जो बुराइयाँ व्याप्त हैं वह सब पहले भी थीं किन्तु उस समय की राजनैतिक व्यवस्था में वह प्रचारित नहीं हो पाती थीं। अब सब कुछ बंद नहीं रहता है। इस युग की विशेषता है कि आदमी को पहले जैसा कठोर शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता है। बड़े-बड़े कार्य वह मशीनों की सहायता से अच्छा और जल्दी कर लेता है। इससे आदमी का विपरीत प्राकृतिक परिस्थियों में जीवन आसान हुआ है। इस युग की अनेक खूबियों के बीच एक बुरी बात भी पनपी है। वह यह कि मशीनों के बीच रहते हुए उसमे संवेदन-सून्यता समा जाना। इससे मानवीय संबंधों को ठेस पहुँची है। आज उसे तत्काल दूर किए जाने की आवश्यकता है। महोत्सव रसरंग के लिए किए जाते हैं…..जिसमें सहभागिता करने वालों के अपने अपने स्वार्थ होते हैं।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 20, 2011

    बंधुवर  आपने सही कहा कि महोत्सव रसरंग के लिए किए जाते हैं…..जिसमें सहभागिता करने वालों के अपने अपने स्वार्थ होते हैं। कल्कि महोत्‍सव में  जिसमें संतों की सह भागिता हो , आघ्‍यात्‍म और भक्ति की रसधार बहनी चाहिए  उसमें ऐसे आइटम गानों पर डांस होना क्‍या उचित है ???

sumeet dwivedi के द्वारा
November 19, 2011

बेहूदगी की हद है…..ऐसे संतों ने हमारी संस्कृति को बदनाम किया हुआ है

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 19, 2011

    सही कहा आपने , ऐसे आयोजन में आइटम डांस तो सहन नहीं किया जा सकता ।

    Dr.Danda Lakhnavi के द्वारा
    November 20, 2011

    ऐसा माना जाता है कि संत पवित्रता की प्रतिमूर्ति हैं, पारस हैं। उनके स्पर्श से संसार के क्लेश कट जाएंगे…परन्तु ऐसा नहीं होता है। संतों की अपनी सीमाएं हैं। वे अपनी सीमा में रह कर अपना काम करते हैं। आपके अनुसार लगता है कि….आइटम गर्ल गीत अपवित्रता ठीकरा। मेरे विचार से यह सोचना अप्रासंगिक है। सधारण जनों के हित में गूढ़ विषय को समझाने के लिए साहित्य में साधारणीकरण की व्यवस्था दी गई है। आइटम गर्ल को…साधारणीकरण का प्रतीक समझिए। हाँ, यह साधारणीकरण परिकृत होना, चहिए भोडा नहीं।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 20, 2011

    इस श्रेणी में रासलीला  को तो रखा जा सकता है लेकिन इन्‍हें नहीं।  गोपियों के सखा भाव नृत्‍य  तो रखे जा सकते हैं लेकिन इन्‍हें नहीं । बिहारी के दोहे, जायसी के पद ,कालिदास की रचनाओं की तुलना इनसे नहीं की जा सकती।

VINEET के द्वारा
November 18, 2011

भाई साहब ,यह संत नहीं आइटम संत हैं इन्हीं ने तो देश का नाश किया है

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 19, 2011

    भई वाह , विनीत जी क्या उपाधि दी है आपने I विल्कुल सही है

pawanagarwala के द्वारा
November 18, 2011

सही लिखा है आपने, देश की संस्कृति को खत्म करने में कल्कि धाम के संत तो अंग्रेजों से भी आगे निकल गए

sanjay rustagi के द्वारा
November 17, 2011

डाक्टर साहब, व्यस्तता की वजह से प्रतिक्रिया देने में देरी हो रही है। आपने बिल्कुल सही मुद्दा उठाया है। आयोजन वाले दिन ही मेरे मन में भी ऐसा विचार आया था।  समाज को नई दिशा देने का दावा करने वाले साधु संत ही अश्लीलता परोसने वाले नाच पसंद करने लगेंगे। तो फिर ऐसे सुधारकों से उम्मीद करना ही निरर्थक साबित होगा। कलियुग भी ऐसी इजाजत नहीं देता है। संजय रुस्तगी 

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 17, 2011

    इस तरह के आयोजनों से  पूरे संत समाज की  छवि घूमिल हो रही है। कम से कम संत समाज और धार्मिक संगठनों को तो इस पर अपना नजरिया स्‍पष्‍ट करना चाहिए। यही नहीं  बुद्धिजीवी वगै को भी इस पर अपना मत व्‍यक्‍त करना चाहिए।

sanjay rustagi के द्वारा
November 17, 2011

डाक्टर साहब कुछ व्यस्तता के कारण प्रतिक्रिया देने में देरी हुई। इस आयोजन वाले दिन ही मेरे मन में यह सवाल आया था, कि कलियुग चाहे जैसा भी हो, यह धार्मिक आयोजनों में अश्लीलता परोसने की भी इजाजत हमें नहीं देता। खासतौर पर देश को धर्म के नाम पर सही दिशा देने का दावा करने वाले साधु संत जहां मौजूद रहें, वहां ऐसा नाच समझ से बिल्कुल परे। आपने इस मुद्दे को उठाया, इसके लिए आपको धन्यवाद।

prakash Nautiyal के द्वारा
November 17, 2011

मेरे नजरिए से तो कल्कि महोत्सव में इस प्रकार के आयोजन नहीं होने चाहिएं। आयोजकों को भी इस दिशा में सोचना चाहिए कि इस तरह के आयोजन से समाज में धर्म के प्रति क्या संदेश जाएगा।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 17, 2011

    भाई साहब, आपकी प्रतिक्रिया से मेरा मनोबल बढा है। आखिर क्‍या सोच कर कल्कि पीठाधीश्‍वर आचार्य श्री ने आइटम डांस कराये।

prakash Nautiyal के द्वारा
November 17, 2011

मेरे नजरिए से तो कल्कि महोत्सव में इस प्रकार के आयोजन नहीं होने चाहिए। इससे समाज में धर्म के प्रति अच्छा संदेश नहीं जाता है।

मनोज वशिष्ठ के द्वारा
November 15, 2011

आपने सही मुद्दा उठाया है । ये कलियुग महोत्सव ही है  ये हमारी ग़लती है, कि हम आज के साधु संतों से कुछ ज़्यादा ही अपेक्षा करने लगते हैं ।वैसे, आपकी इस ख़बर से मुझे माता रानी के जागरण की भी याद आ जाती है, जिसमें मौजूदा हिट गानों पर भजन और भेंट बनाकर गायी जाती हैं, फिर सुनने वाले के ज़हन में से माता की जगह मुन्नी और शीला ले लेती हैं । 

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 15, 2011

    नहीं , मनोज जी, जागरण में जिस समय ये भेंटें प्रस्‍तुत की जा रही होती हैं उस समय हम मनोवैज्ञानिक रूप  से भक्ति भाव में लीन होते हैं।  मीरा के भजन यदि   आइटम गर्ल्‍स इस तरह के लटके झटके दिखाकर  प्रस्‍तुत करें तो उनका भाव ही बदल जायेगा’।  भाव भंगिमा,अवसर और स्थिति के अनुसार भावना बदलती है।

brijendra vats के द्वारा
November 15, 2011

कल्किमहोत्सव मे जिस तरह से लडकिया नाची है यह सन्यास धर्म का घोर अपमान है कल्कि मेले मे इन कलँकियों के  कारण हमारी सनातन परम्पराओ  को ठेस पहुची है, प्रमोदकृष्णम किस कल्कि भगवान की बात कर रहे है, पीस टी वी पर डां. जाकिर नाईक कई बार पुराणो का हवाला  देकर मौहम्मद साहब को कल्किअवतार     साबित करचुके है , इसी परम्परा मॆं क्या प्रमोदकृष्णम कल्कि महोत्सव  क राते हैं।लडकियां नचाकर प्राचीन परंपराओं को ध्वस्त करने से बेहतर है कि वे डां नाईक से शास्त्रार्थ करें लेकिन चालू  आइटम हैं करेंगें नहीं   शास्त्रार्थ करने में बुद्धि लगानी पडती है और छॊकरियां नचाकर मनोरंजन के साथ-साथ पूरे साल का जुगाड भी हो जाता है।        पता नहीं भोले हिंदू इन आस्तीन के सांपों को कब पहचानेंगें भाई मनोज जीआपका प्रयास सार्थक है।

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 15, 2011

    धन्‍यवाद वत्‍स जी, धर्म के नाम पर अभी और न जाने क्‍या क्‍या होगा ।

nagi के द्वारा
November 14, 2011

मेरा मानना है की हमको अब ये अश्लीलता स्वीकार कर लेनी चाहिए, आखिर कब तक रोना रोते रहेंगे. आज़ाद देश के नागरिक होने के नाते आप किसी को ज़बरदस्ती रोक नहीं सकते फिर काहे का रोना! सनद रहे हम अपने बच्चों को बचपन से कान्वेंटी तालीम देते हैं जहां पहला पाठ ‘उन्मुक्तता’ का पढाया जाता है फिर हम अपने को एडवांस दिखाने के चक्कर में बच्चों को फूहड़ परिधान पहनने से नहीं रोकते और नाना प्रकार की अनावश्यक ज़रूरतों को पूरा कर अपने को बेहतर अभिवावक साबित करते हैं. और फिर अश्लीलता का रोना रोते हैं अपना सुधार कर लें देश खुद-बा-खुद सुधर जाएगा…..नागेश खरे ‘नागी’ , बांदा up

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 15, 2011

     सही कहा आपने नागेश्‍ा जी , शुरुआत अपने घर से ही होनी चाहिए।   

surendra के द्वारा
November 14, 2011

आपसे सहमत…ये वही ‘गैंग’ है जो हमेशा बाबा रामदेव के खिलाफ दुष्प्रचार करता रहता है….ये ‘पाखंडी’ लोग खुद तो कभी देश के लिए कुछ करते नहीं और जब कोई दूसरा आगे बढ़ता है तो इन्हें जलन होती है, और फिर ये उसकी टांग खीचने में लगे रहते है……इन्ही जैसे लोगो की वजह से धर्म की बदनामी होती है……शायद साधू की पहचान के लिए भी कोई संस्थान बनानी चाहिए…

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 15, 2011

    एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है।

    ashok kumar gupta के द्वारा
    November 23, 2011

    प्रिय भाई डॉ. मनोज कलियुग की चरम सीमा का दृष्टान्त है, जहाँ धरम और अधर्म, नैतिकता और अनेतिकता, सभ्यता और असभ्यता साथ साथ है! आजकल के धर्मगुरुओं, राजनेताओं का स्टार कितना गिर गया है इससे परिलाक्ष्हित होता है! इस तरह के आचरण आज के युवा वर्ग ही नहीं सभी को भ्रमित करते है, और इनको उदाहरण मानकर गलत राह पर चल पड़ते है जरुरत है इन सबके विरोध में मुखर होने की, एक क्रांति की , जो देश समाज और इस पीढ़ी को मार्गदर्शन करे! ===अशोक कुमार गुप्त, मंत्री बड़ाबाज़ार लाइब्रेरी, कोलकाता

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    November 24, 2011

    अशोक जी, सही कहा आपने, इस तरह के आचरण आज के युवा वर्ग ही नहीं सभी को भ्रमित करते है, और इनको उदाहरण मानकर गलत राह पर चल पड़ते है जरुरत है इन सबके विरोध में मुखर होने की। आपका बहुत बहुत आभार ।।


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