blogid : 3327 postid : 122

...तमाशा जन्मदिन का

  • SocialTwist Tell-a-Friend

लोग आये
उन्होंने
मोमबत्तियां बुझाईं
केक काटा
तालियां बजाईँ
और
नारे उछाले
“हैप्पी बर्थ डे टू यू ”
फिर उन्होंने
बच्चे को देखा
उसके मम्मी -डैडी को देखा
एक अर्थभरी
मुस्कान फैंकी
और
बच्चे के हाथ में
पकड़ा दिया एक
वज़नी लिफाफा
और बढ़ते गये
खाने की टेबिल की ओर
देर रात तक
यह सिलसिला
चलता रहा
और बच्चा
टुकुर टुकुर देखता रहा
मम्मी डैडी को
लिफाफों को
और लोगों की
मुस्कान को
देखते देखते
यह तमाशा
अपने जन्मदिन का
जब थक गया बच्चा
तब, सबकी नजर बचा
एक बूढ़ी नौकरानी आई
उसने
सिर्फ उसके सिर पर
प्यार भरा हाथ फेरा
और
मुस्कराई
अब बच्चा
टुकुर टुकुर नहीं देख रहा था
खिलखिला रहा था

## डा. मनोज रस्तोगी, मुरादाबाद (उ.प्र.)

| NEXT



Tags:       

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (29 votes, average: 4.83 out of 5)
Loading ... Loading ...

21 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vandna के द्वारा
December 3, 2011

मनोज जी वर्तमान में प्रचलित खोखली औपचारिक रीतियों पर आप कि भेदी दृष्टि गयी…साधुवाद…सच दिनों दिन बढ़ते ये औपचारिक समारोह जिनमे उस अवसर विशेष की आत्मा का अभाव और मात्र दिखावा तड़क..भड़क ही रह गया है…बहुत हारा सा अनुभव करते हैं हम ….लगता है बहुत कुछ मुट्ठी से निकलता जा रहा है…

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 4, 2011

    वंदना जी, सही कहा आपने । आजकल ऐसे आयोजन स्‍वार्थपूर्ति के माध्‍यम बनते जा रहे हैं।

Sangya के द्वारा
December 3, 2011

ऐसा होना बहुत दुखद है , बच्चे का जन्मदिन मनाने में पालाकगन खुद इतना राम जाते हैं कि यही भूल जाते हैं कि ये ख़ुशी बच्चे ने दी है , इस दिन खुशियों पर पहला हक़ उसी का है.

Rishi Bhargava Raj के द्वारा
December 3, 2011

रस्तोगी जी ,मानवता पर भौतिकता के हावी होने कि सच्ची और सटीक अभिव्यक्ति के लिए साधुवाद ….

k saurabh के द्वारा
March 18, 2011

priya manoj ji, Bachche ke janm din par hum bhi aisi galti kar baithte hain. Vaastav me dikhave ki is andhi daur me bal mann ki vyatha ko samajhane ka apka pryas saharaniya hai. Bodhpurna kavita ke liye badhaai.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    March 26, 2011

    सौरभ जी , आपका बहुत बहुत आभार .

Vipul के द्वारा
March 17, 2011

This tells us how mechanized and selfish we have become. In this fast life and rat race there is no room left for feelings, respect and emotions. Just compare the number of guests we have in marriage parties these days – 800 to 1000. Do you think it is possible to give personal attention to these many people by the host? All these things have just become a formality. Give envelope, have dinner and go back. Most of the people don’t even have time to greet the bride and groom. These occasions have just become the platforms for business and making favours. Good sarcasm!

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 27, 2011

    विपुल जी ,बात तो आपकी सही है लेकिन इस ओपचारिकता के बीच कुछ लोग अपने स्वार्थों की पूर्ती कर ही लेते हैं

siddharth singhal के द्वारा
March 12, 2011

सर , आपकी कविता एक सबक है उन लोगों के लिए जो बच्चो के जन्मदिन को भी भुनाते है . आपको बहुत बधाई

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    March 14, 2011

    सिद्दार्थ जी आपका बहुत बहुत आभार.

SKKJI के द्वारा
March 12, 2011

Cure yourself of insulin dependent diabetese visit — ayurngo .promarket . in

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    March 14, 2011

    ??????????? धन्यवाद .

Thakur के द्वारा
March 12, 2011

डाक्टर साहेब ये तहजीब हमें किस मोड़ पर ले आयी है ? आगे आने वाली पीढियां इसी को ग्रहण कर रहीं हैं उन्हें ये मालूम ही नहीं के हमारी भी कोई अपनी बेमिसाल तहजीब थी | बहुत शुक्रिया |

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    March 14, 2011

    हमें अपनी परम्परा नहीं भूलनी चाहिए प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद .

Thakur के द्वारा
March 12, 2011

डाक्टर साहेब ये तहजीब हमें किस मोड़ पर ले आयी है ? आगे आने वाली पीधेयाँ इसी को ग्रहण कर रहीं हैं उन्हें ये मालूम ही नहीं के हमारी भी कोई अपनी तहजीब थी | बहुत शुक्रिया |

vivekvinay के द्वारा
March 11, 2011

एक वास्तविकता को प्रस्तुत करते हुए लेखन हेतु आपका बहुत बहुत धन्याद .

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    March 14, 2011

    vivekvinay ji आपको कविता पसंद आई इसकेलिए आपका आभारी हूँ .

himanshu bansal के द्वारा
March 11, 2011

मनोज जी आपकी यह कविता पढ़ कर सोचने लगा क्या लिखूं . शब्द ही नहीं मिल रहे .वास्तव में हमने जनम दिन को भी अपना स्टेट्स सिम्बल बना लिया है. बच्चा क्या चाहता है हम यह नहीं समझना चाहते .

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    March 14, 2011

    हिमांशु जी आप लगातार मेरी रचनाएँ देखते हें इसकेलिए धन्यवाद .


topic of the week



latest from jagran