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भेड़ियों के सम्मुख टिका दिया माथ

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रेल की पटरियों सा
हो गया जीवन

कुछ पाने के लिए
हम भटकते रहे
अर्थ लाभ के लिए
बर्फ से गलते रहे

सुख की कामना में
जर्जर हो गया तन

स्वाभिमान भी रख
गिरवीं नागोँ के हाथ
भेड़ियों के सम्मुख
टिका दिया माथ

इस तरह होता रहा
अपना रोज चीरहरन
रेल की पटरियों सा
हो गया जीवन

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

siddharth singhal के द्वारा
March 12, 2011

स्वाभिमान भी रख गिरवीं नागोँ के हाथ समझोते तो करने होते है

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 30, 2011

    सिद्धार्थ जी ,बिना समझोते के जिन्दगी काटना मुश्किल हो जाता है |

    aamm के द्वारा
    December 8, 2011

    बहुत बढ़िया लिखा आपने

    डॉ. मनोज रस्तोगी के द्वारा
    December 9, 2011

    बहुत बहुत धन्‍यवाद आपका ।

nishamittal के द्वारा
March 7, 2011

व्यथा प्रदर्शित करती अच्छी रचना रस्तोगी जी.

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 30, 2011

    निशा जी , आपने व्यथा समझी ,धन्यवाद |

sanjay rustagi के द्वारा
March 6, 2011

मनोज जी बहुत अच्छा

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 30, 2011

    संजय जी .धन्यवाद |

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 5, 2011

आदरणीय डॉ. साहब, व्यथा और विरह दोनों को ही सांकेतिक माध्यम से बखूबी पेश किया है आपने| साभार,

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 30, 2011

    आपने रचना सराही | इसके लिए आपका ह्रदय से आभारी हूँ |

himanshu bansal के द्वारा
March 5, 2011

मनोज जी,सुन्दर रचना है बधाई ।

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 30, 2011

    धन्यवाद


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