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गुहार छात्रोँ की

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।।।।।।।।।। पहले ।।।।।।।।।।

तन – मन से सेवा करूंगा गुरु जी
शिष्य अपना मुझे बना लीजिए
रहूंगा जीवन भर आपका आभारी
बस ज्ञान  मुझको दे दीजिए
नगर से भिक्षा मैँ लेकर आउंगा
हवन के लिए लाउंगा समिधा भी
रहूंगा छत्रछाया मेँ सदैव आपकी
बस शिष्य अपना मुझे बना लीजिए

।।।।।।।।।। अब ।।।।।।।।।।

रुपयोँ का भोग लगाउंगा गुरु जी
बस पेपर आउट करवा देना
बढ़िया सा गिफ्ट लेकर आउंगा
नकल का इंतजाम करवा देना
राशन की दुकान से राशन ला दूंगा
अगली क्लास मेँ जब आउंगा
तो गुरु जी ट्यूशन भी पढ़ लूंगा
जब किसी से कोई पंगा हो जाए
तो फोन इस चेले को कर देना
अबकी एग्जाम मेँ बस गुरु जी
पास मुझको प्लीज कर देना

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

div81 के द्वारा
February 23, 2012

सटीक चित्रण …….वर्तमान मे छात्र और शिक्षक का जो रिश्ता है वो वो कारोबारी हो के रह गया है |

nishamittal के द्वारा
February 23, 2012

शिक्षा के पतन की ओर उन्मुख स्तर पर भाव्परिपूर्ण रचना रस्तोगी जी.

आर.एन. शाही के द्वारा
March 30, 2011

डाक्टर साहब, तब और अब की शिक्षा के यथार्थ में परिवर्तन का रोचक चित्रण । बधाई ।

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 31, 2011

    आदरणीय भाईसाहब जी , आपकी बधाई से मन प्रफ्फुलित हो उठा | अपना आशीष देते रहियेगा |

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 30, 2011

कितनी सहज अभिव्यक्ति वर्तमान परिवेश की बहुत खूब |

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 31, 2011

    रमेश जी ,आपको कविता पसंद आई ,धन्यवाद |

shivendrakumarsingh के द्वारा
March 30, 2011

bahut hi sundar kavita likhi hai, aajkal bilkul aisi hi sthiti hai. dhero shubhkamnaye

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 30, 2011

    शिवेंद्र जी .शुभकामना के लिए आपका बहुत बहुत आभार .

himanshu bansal के द्वारा
February 25, 2011

मनोज जी आज कल गुरु जी भी तो गुरु घंटाल हो गए हें छात्रों का तो कहना ही क्या वो तो अब गुहार नहीं करते सीधे धमकी देते हें .

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 30, 2011

    हिमांशु जी सही कहा आपने . प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद .

k saurabh के द्वारा
February 25, 2011

मनोज जी, आपके इस व्यंग पर मुझे बचपन का यह व्यंग याद आ गया – जाका गुरु भी अंधला चेला निपट निरंध. अँधा अंधौ ठेलिया दोउ कूप पडंत! बहुत सुन्दर रचना शुभकामनाएं!

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    March 30, 2011

    सौरभ जी , बहुत बहुत आभार .

sanjay rustagi के द्वारा
February 22, 2011

मनॊज जी बेहतरीन व्यंग 

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 24, 2011

    संजय जी ,आपकी शुभकामना से मनोबल में बृद्धि होती है

ravindrakkapoor के द्वारा
February 21, 2011

आज की दशा पर सुंदर चित्रण. सुभ कामनाओं के साथ …रवीन्द्र

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 23, 2011

    dhanyavad

deepak mehrotra के द्वारा
February 21, 2011

मनोज जी आपने विल्कुल सही लिखा है आज कल के छात्र यही कहते है सुन्दर रचना के लिए बधाई

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 23, 2011

    दीपक जी इसके लिए जिम्मेदार कोंन है इसपर विचार होना चाहिए

utkarsh singhal के द्वारा
February 20, 2011

आपकी कविता बहुत सुन्दर है मजा आ गया

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 23, 2011

    उत्कर्ष जी ,धन्यवाद

Alka Gupta के द्वारा
February 20, 2011

बहुत बढ़िया व्यंग्य….आज के ज़्यादातर शिक्षक और शिक्षार्थी ऐसे ही हैं !

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 23, 2011

    अलका जी ,हमें इस और सोचना होगा . सराहना के लिए आभार .

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 20, 2011

आदरणीय रस्तोगी जी…….. सुंदर व्यंग…. वर्तमान समय के शिक्षकों और छात्रों के बीच का सम्बन्ध कुछ यूँ ही है……….

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 23, 2011

    पियूष जी , बहुत बहुत धन्यवाद.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 23, 2011

    पियूष जी ,बहुत बहुत धन्यवाद.

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 20, 2011

बहुत खूब सर आनंद आ गया बहुत सुन्दर व्यंगात्मक कविता \\ बधाई स्वीकार करें .. इसी के आगे दो पक्तिय मेरी और से … ————————————————————————- छोड़ो बच्चों जाए भाड़ में, पढ़ना और पढ़ाना || आओ मिलकर सिगरेट फूंके, ब्रांडेड वाला लाना || चंद पढ़ाकू बच्चों से तुम, पीछा मेरा छुडाओ | जाओ जाकर कैंटीन से, गरम समोसा लाओ | ———————————————————————— रात रात भर जाग जाग कर, उल्लू पढ़ते होंगे | नए शहर में वही पुराने, बुद्धू लगते होंगे || गृह परीक्षा में यदि तुमको, प्रश्न समझ ना आये | ऐसा फेंको और लपेटो \’डी\’ कॉपी भर जाए || ———————————————————————— फिर तुमको अच्छे अंकों से, कौन रोक सकेगा | मैं सही यदि टिक लगाऊं, क्रोस कौन करेगा || समझो दोनों दुखियारों की, गाडी दौड़ पड़ेगी | डरो नहीं बस यही दौड़ है, दुनिया ख़ाक करेगी ||

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 23, 2011

    शैलेश जी ,आपकी कविता पर लिखी कविता ने तो कमाल कर दिया . बधाई .

    himanshu bansal के द्वारा
    February 25, 2011

    शैलेश जी आपकी कविता से में सहमत हूँ.सुंदर रचना . बधाई

vijay madhesia ballia के द्वारा
February 20, 2011

Mr. Rastogi ji very gud defination. Guru-Sisya & Teacher-Student k sath hi Gurukul-School//College ke modern hote Explenation & Najariya se to ab realy teacher & padhae k Garima ki to Watt si lag gayi hai.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 23, 2011

    विजय जी ,निश्चित रूप से कई मायनों में गुरुकुल पद्दति बेहतर है .


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