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सड़क , बंधुआ मजदूर और भगवान

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रात को
अक्सर
रात को
मैँ शहर मेँ घूमता हूँ
काली, पसरी और
गढ्रढेदार सड़क
देखकर
मुझे अहसास होता है
किसी बंधुआ मजदूर का
जो दिनभर की थकन
उतारने के लिए
पसर गया हो
और
मालिक की तरह
भौंकते हुए कुत्ते
उसकी नीँद मेँ
खलल डाल रहे होँ
सड़क के दोनोँ ओर
फुटपाथ पर
बच्चोँ को सोया देख
मुझे याद आता है
बच्चे भगवान होते हैँ
मैँ सोचता हूं
भगवान का स्थान
क्या फुटपाथ पर होता है

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

k saurabh के द्वारा
February 7, 2011

प्रिय मनोज जी, आप नयी कविता के एक अच्छे कवि के रूप में उभर कर आ रहे हैं. शैली सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सरीखे ख्यातिलब्ध कवियों से पूरी तरह मेल खा रही है. अपने चिंतन का काव्यमय रूपण जारी रखें, नयी कविता का सशक्त हस्ताक्षर बनने की आपमें असीम संभावनाएं हैं. शुभकामनाएं!

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 9, 2011

    aapki shubhkamna ke liye dhanybad

baijnathpandey के द्वारा
February 5, 2011

बहुत हीं विचारोत्तेजक रचना …….सादर आभार

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 9, 2011

    bahut bahut dhanybad

Himanshu Bansal के द्वारा
February 3, 2011

aanand aa gya Manoj ji

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 9, 2011

    dhanyabad

nishamittal के द्वारा
February 1, 2011

बहुत अच्छी मन को छु लेने वाली रचना मनोज जी.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 3, 2011

    निशा जी ,आपको मेरी कवितायेँ पसंद हैं ,इसके लिए आभारी हूँ . यह सिलसिला बनायें रखियेगा .

gopalji54 के द्वारा
January 31, 2011

मनोज जी, आपने जो पढ़ा है वो आपको पढाया गया : to make you emotional patient अन्यथा पालनहार तो हम है छोटे बच्चों के, हम है भाग्यविधाता बच्चो के हमें सोंचना चाहिए और कुछ ठोस करना चाहिए अच्छी अभिव्यक्ति

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    February 3, 2011

    गोपाल जी ,धन्यवाद


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