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आखिर कब फिरेंगे घूरे के दिन

Posted On: 22 Nov, 2010 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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आखिर कब फिरेंगे घूरे के दिन

मैं जानता हूं
जब मेरे किसी मित्र के
शुभागमन पर
अंदर से
पत्नी की कर्कश आवाज आती है
चाय ले लीजिए
तो उस आवाज में
कितनी कुढऩ होती है
उबली हुई चाय की पत्ती
जैसी कड़ुवाहट होती है
मैं समझ जाता हूं
कि आज फिर
उधार ली गई
चीनी की चाय बनी होगी
मैं देखता हूं
जब बच्चे
मिठाई खाने की जिद करते हैं
और मैं उन्हें
स्वाध्याय का महत्व समझाकर
कुछ पत्रिकाएं खरीद लाता हूं
तो उनकी आंखों में
कितनी निराशा होती है
अपने खुश्क होठों पर
जीभ फेर कर
वह फोटो देख और चुटकुले पढ़ते हुए
मुंह का बिगड़ा जायका बदलने लगते हैं।
मैं सोचता हूं
कि आखिर कब फिरेंगे घूरे के दिन
और कब पूरे होंगे बारह साल

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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepa singh के द्वारा
January 9, 2013

ह्रदय स्पर्शी कविता आदरणीय मनोज जी.वन्देमातरम. http://deepasingh.jagranjunction.com पर पधारें.

shobhit mehrotra के द्वारा
January 3, 2011

कविता अच्छी लगी.बधाई

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    January 9, 2011

    धन्यवाद

Atul के द्वारा
December 23, 2010

Bahut samay bad aapki kavita padhne ko mili.Hame aapki nayee kaviota ka intejar rahega.

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    December 28, 2010

    बहुत-बहुत आभार

Himanshu Bansal के द्वारा
December 18, 2010

बधाई हो।

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    December 28, 2010

    dhanyvad

HEMANT के द्वारा
December 13, 2010

कि आज फिर उधार ली गई चीनी की चाय बनी होगी सचमुच इस महगाई के युग मे उधार के सहारे ही जिंदगी कट रही है

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    December 14, 2010

    हेमंत जी , बहुत – आभार।

VIKAS के द्वारा
December 13, 2010

very realistic

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    December 14, 2010

    आभार

milan mishra के द्वारा
December 1, 2010

 मौलिकता असरदार हॊती है. प़यास सराहनीय है. 

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    December 14, 2010

    बहुत बहुत आभार

KAVYA RASTOGI के द्वारा
November 28, 2010

पत्नी की कर्कश आवाज आती है चाय ले लीजिए तो उस आवाज में कितनी कुढऩ होती है उबली हुई चाय की पत्ती जैसी कड़ुवाहट होती है kavi ke antarman ko bakhoobi likha hai aapne. prashansniya kavita.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 30, 2010

    प्रिय काव्य जी, आपकी स्नेहपूर्ण बधाई मिली। धन्यवाद।

vivek sunil Mumbai के द्वारा
November 28, 2010

vaastav men utkrisht aur sargarbhit rachna. Badhaai

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 30, 2010

    विवेक-सुनील जी , आपका बहुत-बहुत आभार।

baqri के द्वारा
November 26, 2010

rachna achchi hai. kuch maulik kawitayen bhi post kariye. ek baar aapne kisi animal par likhi thi!!!!!!

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 30, 2010

    बंधुवर, कविता तो मौलिक ही है लेकिन आपबीती नहीं है। आपने जिस कविता की मांग की है वह जरूर आपबीती है। फिलहाल याद करने के लिए आभार ।

Sanjeev Akankshi के द्वारा
November 26, 2010

Achhi Rachana, Fir bhi ummeeden bani rehna chahiye. Sanjeev Akankshi

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 30, 2010

    संजीव जी, आपको कविता पसंद आई । इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार।

Rahul Sharma के द्वारा
November 26, 2010

bhai wah maza a gaya pad kar.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 30, 2010

    राहुल जी, यह उस वर्ग की पीड़ा है ,जिसकी जिंदगी उधार में कट जाती है। प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

Rahul Sharma के द्वारा
November 26, 2010

bhut sundar kavita

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 30, 2010

    धन्यवाद।

sanjay rustagi के द्वारा
November 25, 2010

इस बार तो कवि के रूप में दिखे अच्छा लगा। बधा

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 30, 2010

    संजय जी, आपकी शुभकामनाएं ही कुछ लिखने की प्रेरणा देती हैं।

sonika के द्वारा
November 24, 2010

aachi hai

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 25, 2010

    बहुत-बहुत धन्यवाद।


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