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हजार-हजार के आठ नोट

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आज उसे पगार मिली थी। सुबह से वह काफी खुश था। हो भी क्यों न…. इस दिन का तो वह पिछले दस दिन से इंतजार कर रहा था। ये दस दिन उसने काटे ,यह तो बस वही जानता है। शाम को बड़े बाबू ने जब हजार- हजार के आठ नोट दिए तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा और वह झूमता हुआ फैक्ट्री के गेट से बाहर निकल गया। जेब में पड़े नोटों को वह कस कर इस तरह पकड़े हुआ था कि कहीं गिर न जायें। अभी वह थोड़ी दूर ही चला होगा कि उसे इंतजार करता हुआ एक चेहरा दिखाई दिया। वह चेहरा उसके दूधिए का था,जिसका वह पिछले महीने भी बिल नहीं चुका पाया था। उसे देखकर उसके चेहरे खुशी की रेखाएं मिटने लगीं और वह उससे नजरें बचा कर जाना ही चाहता था, तभी उसे सामने से आता हुआ एक और चेहरा दिखाई दिया । यह चेहरा राशन के दुकानदार का था, जिससे वह पूरे महीने राशन उधार लेता था। वह उससे भी बच कर निकलना चाहता था कि एक और चेहरा उसकी ओर बढऩे लगा। यह चेहरा था – किराया मांगता हुआ मकान मालिक का। आखिर उसने अपना चेहरा हथेलियों में छिपा लिया लेकिन हथेलियों में भी कतारबद्ध चेहरे दिखाई देने लगे। असमय उभर आईं झुर्रियों भरा उसकी पत्नी का चेहरा….,बीमार पड़ी बूढ़ी मां का खांसता चेहरा….,अभावग्रस्त दोनों बच्चों के कमजोर चेहरे,जो आज सुबह से ही उसके लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। धीरे-धीरे उसके उसके पैर बोझिल होते गये,उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें छलछलाने लगीं। वह जेब में पड़े नोटो को मु_ी में और कसते हुए सोचने लगा….
दो महीने का दूध का बिल-सत्रह सौ रुपये ,राशन का बिल- तीन हजार रुपये,मकान का किराया-बारह सौ रुपये, बिजली का बिल-चार सौ रुपये, गैस का सिलेंडर-तीन सौ पैंसठ रुपये, दोनों बच्चों की फीस पांच सौ रुपये और सब्जी के लिए भी तो चाहिए रोज कम से कम पच्चीस-तीस रुपये….. बाकी खर्चा……..???????

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92 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

UMASHANKER TYAGI के द्वारा
October 3, 2013

आज कल दुनिया में रुपयों की कीमत जयादा है इंसान तो केवल कागज का असली टुकड़ा है वो भी फटा पोस्टर है बेचारा इन्सान जो जल्दी पहुंच जाता है शमशान ………………….

bdsingh के द्वारा
September 1, 2013

अपनी आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति में कर्ज के बोझ में दबा  हुआ बेबस एवं हतास इंसान। हकीकत को बहत अच्छे ढंग से  अभिव्यत किया है आप ने। “गरीब की वेदना” पढ़ने का कण्ट करें। ——————

s.s.agrawal के द्वारा
May 3, 2011

मनोज जी आम आदमी के दर्द का अच्छा खाका खिंचा है. बहुत सुन्दर

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    May 3, 2011

    धन्यवाद अग्रवाल जी .

siddharth singhal के द्वारा
March 12, 2011

बहुत सुन्दर लेख है

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    April 10, 2011

    शुक्रिया, सिद्दार्थ जी |

vineet bansal के द्वारा
February 18, 2011

मनोज जी , आपकी पोस्ट बहुत सही है बास्तव मे अब गुज़ारा होना बहुत मुश्किल होता जा रहा है . यही वज़ह है की चोरी लूट रिश्वत की घटनाएँ हो रही है .

    Dr,Manoj Rastogi के द्वारा
    April 10, 2011

    विनीत जी ,आपका आभार |

anmol के द्वारा
January 9, 2011

भाई बहुत अच्छी पोस्ट है .अब तो प्याज भी महंगी है

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    January 20, 2011

    आपका बहुत-बहुत आभार

sharad malhotra के द्वारा
January 6, 2011

मनोज जी आपकी रचना सोचने पर मजबूर करती है .महगाई तो है ही लेकिन हम झूठी शान मे जीना छोढ़ दे तो हम कम आमदनी मे भी गुजारा कर सकते हैं जरूरत सहनशीलता की है .भूखा न कोई रहता है और न ही मरता है ,मरता बही है जो कर्महीन होता है ,मक्कार होता है ,कामचोर होता है

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    January 9, 2011

    आभार

samarth agarwal के द्वारा
January 5, 2011

महंगाई डायन खाय जात है.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    January 9, 2011

    समर्थ जी धन्यवाद

shobhit mehrotra के द्वारा
January 3, 2011

डॉ मनोज रस्तोगी जी,आपने तो दुखती रग पर हाथ रख दिया. बधाई

    dr manoj rastogi के द्वारा
    January 6, 2011

    बहुत बहुत आभार

HEMANT के द्वारा
December 13, 2010

बधाई सोचने पर मजबूर करती है आपकी रचना

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    December 14, 2010

    हेमंत जी , आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार

sameer के द्वारा
November 26, 2010

bahut sundar

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 27, 2010

    आभार।

pankaj के द्वारा
November 26, 2010

docter saheb mehngai ke is daur me rishte nibhana bahut mushkil hai. bachcho ki fikar kare to maa baap upekshit ho jate hain.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 27, 2010

    पंकज जी, आपका कृतज्ञ हूं।

rajesh के द्वारा
November 26, 2010

bahut achcha likha hai.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 27, 2010

    राजेश जी, आभार।

Sanjeev Akankshi के द्वारा
November 26, 2010

मनोज जी, बेहतरीन लेख के लिय आपको बधाई. लेख के अंत में सात सवालिया निशान वाकई में माध्यम वर्गीय परिवार के जीवन यापन सवालिया निशान ही हैं. परिवार का मुखिया हमेशा यह ही सोच कर त्रस्त और परेशां रहता है की शायद सात जन्म तक यह सवालिया निशान उसका पीछा नहीं छोड़ेंगे. -संजीव आकांक्षी

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 27, 2010

    संजीव जी, आपकी शुभकामनाएं मनोबल बढ़ाती हैं। यह क्रम बनाए रखिएगा।

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
November 26, 2010

मनोज जी बहुत ही अच्छा लेख लिखा है वास्तव में महंगाई ने आम आदमी को पूरी तरह से खा लिया है. कांग्रेस के इस शासन काल में गरीब आदमी और ज्यादा गरीब ,तथा अमीर आदमी और ज्यादा अमीर होता जा रहा है नवीन कुमार शर्मा बहजोई (मुरादाबाद ) उ .प्र. मोबाइल नम्बर – 09719390576

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 27, 2010

    नवीन जी,आपकी प्रतिक्रिया पढ़ी । यह स्थिति तो शुरू से चली आ रही है।

Jogendra rajpoot के द्वारा
November 26, 2010

बधाई हो मनोज जी , आपने महंगाई डायन की तस्वीर बखूबी खींची है । यह डायन हम सबको डस रही है । गरीब व मध्यम तबके को तो इसने निगल ही लिया है । घूसखोरी और भ्रष्टाचार से जो बाकी बचा है उसे महंगाई मार गई है ।

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 27, 2010

    आदरणीय भाईसाहब जी, नमस्ते। आपकी बधाई से मन प्रफुल्लित हो गया। मेरे छोटे से इस प्रयास को आपने सराहा। इसके लिए मैं हृदय से आभारी हूं।

Rahul Sharma के द्वारा
November 26, 2010

manoj ji aap ka lekh bahut badiya hai aur sach mai bahut kuch sochne pe majboor karta hai.

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 27, 2010

    राहुल जी, आखिर हम कब तक सोचते रहेंगे।

Prakash Nautiyal के द्वारा
November 26, 2010

मनोज जी मध्यमवर्गीय परिवार की सही तस्वीर आपने बेहतर ढंग से पेश की, बधाई। हर छोटे-बड़े वर्ग की समस्याओं या फिर स्थिति को भी अपने ब्लाग के जरिये उठाते रहें।

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    November 26, 2010

    देर से ही सही पर उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद

Piyush kumar Singh के द्वारा
November 25, 2010

The article is very good. article show our country poor condition whos people work in govt. srevent, or privete sector.

    Dr.Manoj Rastogi के द्वारा
    November 26, 2010

    पीयूष जी, सबसे ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले यह पीड़ा झेलते हैं।

vikas के द्वारा
November 24, 2010

very touchy

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 25, 2010

    विकास जी, बहुत-बहुत धन्यवाद।

Harish के द्वारा
November 24, 2010

Manoj ji why u discussed about higher upper segaments

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 25, 2010

    हरीश जी , हर वर्ग की अपनी-अपनी समस्याएं हैं। जोड़-घटाने में ही निकल जाती है उम्र।

deepak joshi के द्वारा
November 24, 2010

प्रिय डॉ. मनोज जी, प्रणाम भाई साहब चन्‍द लाईनों में एक आम आदमी की हूबहू तस्‍वीर उतार के आप बना डाली जो आज की सच्‍चाई। बहुत ही अच्‍छे लेख के लिए बधाई। -दीपकजोशी63 http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 25, 2010

    दीपक जी, आपकी बधाई मिली। आपका हृदय से आभारी हूं। इसी तरह मनोबल बढ़ाते रहें।

sonika के द्वारा
November 22, 2010

good

    dr.manoj rastogi के द्वारा
    November 22, 2010

    धन्यवाद

Rashid के द्वारा
November 21, 2010

यथार्थपरक लेख राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 23, 2010

    राशिद जी ,शुक्रिया।

Vipul के द्वारा
November 21, 2010

A very crisp short story depicting the real condition of a common middle class of India. It is ironical that on one hand we have Indians featuring in the list of top richest people by Forbes magazine and on the other hand we have people who don’t even have “hazar-hazar ke do note.” We have all the reasons to be happy for Sensex crossing 20K but at the same time millions of our people don’t even have one meal a day. This disparity is real and horrifying. No wonder crime is increasing at the same rate as Sensex is growing. After all this is the fight for survival. I admit that rich people have their own problems but created by themselves. People below poverty line lead life in unlivable conditions. But our common middle class, which forms a huge chunk of our population has to live up to the expectation of the society even without “hazar-hazar ke aath note.” Really an amazing and touching story in such a simple language. My hearty congratulations.

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 23, 2010

    विपुल जी, आपके विचार पढ़े। वास्तव में यही स्थिति है, मेरा मानना है कि पूंजीवादी व्यवस्था में सर्वाधिक मध्यमवर्गीय व्यक्ति ही पिसता है। जहां एक ओर सरकार लाखों -करोड़ों रूपये अनावश्यक कार्यो में खर्च कर रही है, सांसदों-विधायकों को अपने वेतन-भत्तों की चिंता है,घोटाले-दर-घोटाले हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर देश में बहुसंख्यक लोग सुबह से शाम तक अपना परिवार चलाने के लिए संघर्ष करते हुए अपने भाग्य को कोसते रहते हैं। पता नहीं कब बदलेगी यह स्थिति।

mohitgenx के द्वारा
November 20, 2010

manoj ji haqeeqat bhut hi buri hi. ap to likta hi hajar hajar ka 8 note. per india me ab bhi hajar ka ek note laker parivar chalna balo ki kami nhi hi. ap likta hi middleman ki parshani. per musko harrni hoti hi ki patrkaro ki parshani ko koyi nahi janta. jagran ho ya amar ujala ya koyi local news paper. in sabhi me jab pagar milti hi to bhut hi kum logo ko 8 hajar ka noto ka didar hota hi. bike me tail bhi koyi aur hi dalbata hi. chunki patrkar shan me jita hi. isliy kabhi apna dard bhi nahi bata pata. local news paper mekam karna balo ka liya to kabhi sary ki date asani sa ati hi nahi. laikn kabhi koyi patrkar bhuka nahi marta. hajar ka ek note kamna bala bhi gujar karta hi. yah alg bat hi ki uski patni bhi kam per jati hi. hajar ka 8 note kamna bala logo ko bhi parshani hoti hi. july sa laker june tak bo bhi majdur ki tarh hi kamata hi. musko lagta hi ki yahi middle class ki niyti hi. apka mohit kumar sharma editor newsofgenerationx moradabad

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 23, 2010

    मोहित जी ,यह भी चिंतन का विषय है । इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार।

farha baqri के द्वारा
November 20, 2010

manoj ji apka lekh haqeeqat ke qareeb hai. 8 nahi, isse chand note zyada paane walon ki haalt bhi juda nahi hai. aakhir me aapne sawaliya nishan laga diye hain. mera bhi ek sawal hai. agar baaqi ka kharch poora karne ke liye biwi na kamaye to……???? agli post me ise bhi byan kijyega.

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 21, 2010

    फरहा जी, आपकी बात सौ फीसदी सच है। आज के इस महंगाई के युग में जिंदगी का गुजारा तभी चल पायेगा जब पति-पत्नी दोनों कमायें।

jlsingh के द्वारा
November 20, 2010

यह प्रतिक्रिया मेरी अपनी नहीं कही जा सकती है क्योंकि मैंने इसे उदृत किया है तारक मेहता का उल्टा चश्मा टी वी सीरियल से जिसमे गोकुल धाम के एकमेव सेक्रेटरी आत्माराम तुकाराम भिड़े अपनी पत्नी माधवी से कहते हैं. हम मध्यम वर्गीय लोगों के सपने पापड़ की तरह होते हैं – न जाने कब टूट जाय! और किस्मत स्कूटर के अगले पहिये के समान, चाहे पिछले चक्के को जितना जोर घुमा लो किस्मत का पहिया हमेशा दो कदम आगे ही रहता है. अजीब दर्द झलकता है इन पंक्तियों में! यही है जिन्दगी!

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 21, 2010

    बंधुवर, सही कहा आपने ‘नसीब अपना- अपनाÓ। प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

RAJ KUMAR PANDEY के द्वारा
November 19, 2010

I HAVE READ A GOOD STORY AFTER A LONG TIME LONG YEARS. I REMEMBERED MY LIFE WHEN WE SPENT FEW DAYS TOGETHER. CONGRATULATIONS. RAJ KUMAR PANDEY

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 21, 2010

    भाई साहब, आपको रचना अच्छी लगी। यह पढ़कर सुखद अनुभूति हुई। यह तो आपके ही प्रोत्साहन और पे्ररणा का परिणाम है।

FAIZAN AHMAD के द्वारा
November 19, 2010

कहानी बहुत अच्छी और वर्तमान हालत पर अच्छा कटाछ्य है .

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 21, 2010

    फैजान जी , इसी तरह अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराते रहें। आपका बहुत बहुत आभार

Tanu , Rudrapur के द्वारा
November 18, 2010

हेल्लो सर , अपने जो लिखा है वो कही तक सही है पर ऐसे इन्सान को शादी से बचना चाहिए है और अगर की तो प्लेअसे बच्चो के लिए तो बिलकुल न सोचे …….अगर फिर भी आगे बढ़ जाएँ तो याद रक्खें की…. ताकत कम गुस्सा ज्यादा ये लक्षण पिट जाने को और आमद कम खर्चे ज्यादा ये लक्षण मिट जाने को……….ओके एंड धन्यवाद महान इस विचारपूर्ण स्टोरी के लिए.

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 21, 2010

    तनु जी, आपके विचार पढ़े, धन्यवाद।

neha zaidi के द्वारा
November 18, 2010

This article shows the life of present middle class family for it the writer able to congragulation

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 18, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

Atul के द्वारा
November 18, 2010

This article shows the real picture of a worker/clerk or a serviceman living his life with a very small salary which could not fulfil even his daily needs with everyday rising inflation.

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 18, 2010

    अच्छा लगा। धन्यवाद।

nitin ,jaipur के द्वारा
November 17, 2010

your article is really marvellous.it is depicting how a middle class person carry his life. many persons of soceity can connect themself with this bitter truth. congratulations for your article. (sorry for not giving my response in HINDI as some characters are not available)

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 18, 2010

    नितिन जी, आपकी बधाई मिली। अच्छा लगा। धन्यवाद।

sanjay rustagi के द्वारा
November 16, 2010

हार्दिक बधाई

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 18, 2010

    संजय जी, हर बार की तरह इस बार भी आपने बधाई दी है। आभारी हूं।

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 18, 2010

    बंधुवर, इतनी अच्छी प्रतिक्रिया,पढ़कर शब्द नहीं मिल रहे कि आपको कैसे बधाई दूं। बहुत अच्छा लिखा है आपने। कौवे को प्रतीक बना कर जिस तरह आपने सामाजिक विसंगतियों पर पैने प्रहार किये हैं ,वह निश्चित ही सोचने पर विवश करते हैं। आभार सहित आपको बार-बार बधाई। आशा है कि आप अपनी लेखनी का सिलसिला जारी रखेंगे। डा.मनोज रस्तोगी

ksaurabh moradabad के द्वारा
November 13, 2010

आपके इस ब्लॉग के कमेंट्स में विशाल गुप्ता जी ने उच्च वर्ग की कठिनाइयों का चिंतन किया है. निश्चित रूप से यह एक बहस का विषय हो सकता है. आशा है की आप उच्च वर्ग की मनोस्थिति पर भी अपने विचारों से हमें अवगत कराएँगे .

    Dr. Manoj Rastogi के द्वारा
    November 15, 2010

    के सौरभ जी , सुविधाभोगी वर्ग की अपनी अलग ही समस्याएं हंै। जरूरत बदल जाती है आकांक्षा और आकांक्षा बदल जाती है महत्वाकांक्षा में । समय मिला तो आपकी इच्छा पूरी करने का प्रयास करूंगा।

    vishal gupta के द्वारा
    November 15, 2010

    Mirror mirror on the wall—————–aal is not well In continuation of my previous reply now i quote bansmati chawal(rice) katha. When i was in Mumbai we use to be a happy family bcos we use to eat bansmati @ 24/ Kg. Soon it reached to Rs 28/ and the day came when it jumped to 45/ . My kirana storekeeper like a good psychitiarist/ neta assured me that 2morow 28/ vala chawal aa jayega.I am waiting for tat 2morow and even after 4 years , i m stiil waiting ,inteha ho gaye intjaar ki. Janab aapka kaya haal hai ?

    Dan Chetri के द्वारा
    November 15, 2010

    सवेरे-सवेरे पांच बजे मेरी आंख खुली। लेकिन नींद पूरी नहीं होने की वजह से नींद अभी भी बोझिल थी। मेरी आंख दुबारा लग गई। लोग कहते हैं कि सुबह-सुबह आया स्वप्न सच होता है। आंख लगते ही एक स्वप्न मेरे दिमाग में स्पष्ट होकर घूमने लगा। एक कौवा महानगर की सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठा कांव कांव कर रहा है। आज पहली बार एक कौए की भाषा मेरी समझ में आई। उसकी कांव-कांव में बड़ा दर्द है। वह जोर-जोर से चिल्ला रहा है, ”मुझे पानी दो! कोई मुझे पानी दो!! मैं दूर-दूर तक घूम आया, कहीं पानी नही मिला है।” मैंने उसे कहा, ”तुम यहां फुटपाथ पर क्यों बैठे हो? किसी ऊंचे भवन पर बैठकर पानी देखो।” कौवा बोला, ”ऊंचे भवनों पर बैठकर तो बहुत चिल्ला लिया। अब सोचता हूं कि यहां बैठे को कोई जल दे दे।” मैंने कहा, ”इनमें से तुम्हे कोई जल नहीं देगा। मनुष्य जाति बड़ी स्वार्थी हो गई है। ये लोग अपने काम के पीछे पागल हो गए है कि खुद पानी पीने की फुर्सत मुश्किल से निकाल पाते है, तुम्हे क्या पिलायेंगे। इनसे आस मत करो। जाओ उड़कर खुद पानी ढूंढ़ो। परिश्रम करो, कहीं ना कहीं जरूर मिल जायेगा। परिश्रम का फल हमेशा मीठा होता है।” वह कहने लगा, ”कब से परिश्रम ही तो कर रहा हूं। पानी की तलाश में उड़ते-उड़ते मेरे प्राण सूख चुके है। सोचा था आज कहीं दूर की उड़ान भरूं, और दूर की उड़ान के चक्कर में उड़ता-उड़ता इस महानगर में निकल आया। अब इसमें भटक गया हूं। इन मकानों के जंगल के बीच से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा। और ना ही कहीं पानी है।” मैंने कहा, ”तुम्हारे लिए यहां पानी नहीं है। पानी तो लोगों के मकानों के अंदर बंद है। मगर फिर भी कोशिश करो, कहीं न कहीं थोड़ा बहुत पानी जरूर मिल जायेगा।” कौवा बोला, ”तुम्हारे मकान में भी तो पानी होगा। तुम मुझे पानी क्यों नहीं देते?” मैंने सोचा, ”हां मैं भी तो इसे पानी दे सकता हूं।” लेकिन पता नहीं क्यों मैं खुद को उसकी प्यास बुझाने में असमर्थ पाता हूं। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। और फिर मेरे कहेनुसार वह कौवा वहां से उड़ चला। थोड़ी दूर उड़कर वह एक मकान की छत पर जाकर बैठ गया। उससे उड़ा नहीं जा रहा। मालूम नहीं कैसे मैं भी वहीं पहुंच गया। कौवा फिर कुछ दूर उड़कर दूसरे मकान की छत पर बैठ गया। उसकी सांस फूली हुई है। उसका शरीर शिथिल पड़ता जा रहा है। उसमें चलने की भी हिम्मत नहीं है। पानी की तलाश में घूम-घूमकर थकान के कारण उसने अपनी प्यास और ज्यादा बढ़ा ली है। उस मकान की छत से उसे एक गंदा नाला दिखाई दिया। उस नाले का पानी उस कौए के रंग से भी ज्यादा काला है। शहर के कारखानों के जहरीले रसायन भी उसी नाले से होकर आते है। उसकी बदबू दूर तक महसूस की जा सकती है, लेकिन फिर भी उस कौए की प्यास की तड़पन उसे उस गंदे नाले की तरफ खींच ले गई। उसने उस नाले से एक चोंच भरी, मगर फिर उस गंदे पानी को वापस उलट दिया। वह सड़ा हुआ पानी उसके गले नहीं उतरा। मुझे उस तड़पते कौए को देखकर बड़ा तरस आ रहा है। उसकी स्थिति बड़ी दयनीय है। लेकिन मेरी समझ में ये बात नहीं आ रही कि मैं इसे पानी देने में खुद को असमर्थ क्यों पाता हूं। वह कौवा धीरे-धीरे अपने पंजों से जमीन पर कुछ दूर चला और एक दीवार की छांह में जाकर लेट गया। सूरज की चिलचिलाती धूप में वह दीवार भी उसे जलती हुई प्रतीत हो रही है। लगभग पंद्रह मिनट तक उसने आराम किया। आराम के कारण उसकी थकान को मामूली आराम जरूर मिला, मगर उसका गला लगातार सूखता जा रहा है। उसे आराम की नहीं थोड़े से जल की जरूरत है। वह अपनी पूरी ताकत लगाकर फिर से कुछ दूरी तक उड़ा और एक दीवार पर बैठ गया। वहां उसने देखा कुछ दूरी पर एक सत्संग हो रहा है। वो कौवा गुरु का ज्ञान सुन रहे भक्तजनों से कुछ दूर ही जमीन पर बैठकर कांव-कांव करने लगा। हालांकि उसमें बोलने की ताकत नहीं है। लेकिन फिर भी उसकी प्यास उसे जोर-जोर से बोलने पर मजबूर कर रही है। कोई भी उसकी भाषा नहीं समझ पा रहा, मगर मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही है। – ”पानी दो, मुझे दो घूंट पानी दो। मैं प्यास के मारे मरा जा रहा हूं। क्यों इस गुरु के चक्कर में अपना जीवन व्यर्थ कर रहे हो। मुझे पानी दे दो, तुम्हे देवता जैसा स्थान मिलेगा। मेरी प्यास बुझाओ, प्यास से मेरे प्राण निकले जा रहे है। मुझे पानी दो, पीने के लिए दो घूंट पानी दो। कौवा प्यासे हृदय से गिड़गिड़ा रहा है।” सभी को उसकी कांव-कांव ही सुनाई देती है। तभी उनमें से एक व्यक्ति बोला, -अरे भगाओ यार इस कौए को, ये कुछ भी सुनने नहीं देता। इतना आनंद आ रहा था, इसने सारे पे पानी फेर दिया। भगाओ इसको। तभी उनमें से एक व्यक्ति उठा और हाथ हिलाते हुए कौए की तरफ बढ़ने लगा, ”जाता है कि नहीं यहां से।” कौए ने दो पंख मारे और उस आदमी के जाने के बाद दुबारा कांव-कांव करने लगा, ”अरे दुष्टों दो घूंट पानी दे दो। प्यासे की प्यास बुझाओ, बड़ा सुख मिलेगा।” तभी गुरु जी ने सभी को ध्यान में लीन होने के लिए कहा। सभी ध्यान में लीन हो गए। अब कौए की कांव-कांव की आवाज पहले से तेज सुनाई दे रही है। वही आदमी दुबारा उठकर आया और उसने जोर से कौए की तरफ एक पत्थर फेंका। बड़ी मुश्किल से उस पत्थर के प्रहार से कौए ने अपना बचाव किया और जैसे-तैसे उड़ा और कुछ दूर जाकर बैठ गया। उसका गला अधिक बोलने की वजह से हद से ज्यादा सूख चुका है। उसकी आंखें पथराई जा रही हैं। जमीन पर खड़ा होना भी उसके लिए मुश्किल है। मगर उसकी प्यास उससे उड़ान भरवा रही है। वो अभी भी चिल्ला रहा है। कुछ देर बाद अपनी पूरी शक्ति लगाकर पानी के लिए फिर उड़ा। मगर इस बार उसके शरीर ने उसका साथ नहीं दिया। दो चार पंख फड़फड़ाकर वह कौवा बेहोश होकर सड़क पर जा गिरा। एक तेज रफ्तार से आती हुई कार उसके ऊपर से निकल गई और उसके खून के छीटे मेरे चेहरे पर आ गिरे। एक झटके के साथ मेरी आंख खुल गई। इस प्रकार उस कौए की प्यास बुझी। मेरा दिल बहुत दुखी हुआ। उस कौए की वही आवाज ‘मुझे पानी पिलाओ’ अभी भी मेरे कानों में गूंज रही है। लोग कहते है कि सुबह-सुबह आया स्वप्न भविष्य में होने वाली घटनाओं की सच्चाई को बयां करता है। अब मैं अपने बिस्तर पर बैठा सोच रहा हूं, शायद आने वाला वक्त पशु-पक्षियों के लिए ऐसा ही हो। जब इंसान को खुद के लिए पानी की कमी महसूस होगी, तो वो पशु-पक्षियों को पानी क्यों देगा। पशु-पक्षी ऐसे ही प्यास से तड़पते-तड़पते मर जायेंगे। अगर उन्हे कहीं जल मिलेगा भी तो उन्हे इतना गन्दा जल नसीब होगा जो इंसान की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले कारखानों और फसलों में गिरने वाले रसायनों के कारण जहरीला हो चुका होगा। उस अकेले कौए की हालत ऐसी नहीं होगी। सभी पशु पक्षियों की यही हालत होगी और इसका जिम्मेदार होगा इंसान, डान छैत्री आसाम

anoop, chennai के द्वारा
November 13, 2010

मनोज जी आपने ने आशानुरूप लिखा है गरीब व्यक्ति की मानसिक स्थिति के.

    Dr. Manoj Rastogi के द्वारा
    November 15, 2010

    आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

vivek sunil kumar, mumbai के द्वारा
November 13, 2010

manoj ji really stated the condition of a lower middle class man in very few words. pl. continue.

    Dr. Manoj Rastogi के द्वारा
    November 15, 2010

    विवेक सुनील जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

kavya rastogi के द्वारा
November 13, 2010

dr. manoj जी आपके इस लेख ने मुंशी प्रेमचंद के युग की याद दिला दी. वास्तव में काफी समय बाद ऐसा मर्मस्पर्शी ब्लॉग देखने को मिला. बधाई!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 13, 2010

एक निम्न वर्ग के व्यक्ति की मनोदशा का उत्कृष्ट वर्णन…………… हार्दिक बधाई…………….

    Dr. Manoj Rastogi के द्वारा
    November 15, 2010

    पीयूष जी , आपको रचना पसंद आई, आभारी हूं

vishal gupta के द्वारा
November 12, 2010

Very realistic and actual citation from hamari tumahari sabki jindgi, but case with so called rich is not too much different , the difference is makan ka kiraya turns into heavy EMIs that too is snatched by Bank itself with no opportunity for any reaction except a false assuranse to self that aal is well. And the story continues with repeating episodes in the name of so called donation requested by children schools , year long Dewali Bakhshis, community fees, RWA fees ete. I felt that i am Abhimanu of Kalyug who is sorrounded by not only 100 Kauravs but also my so called APNE the Pandavs, who too are ready to cheat me in the name that bhai sahab hum to aap ke apne hi hai? Do`nt u feel so?

    Dr. Manoj Rastogi के द्वारा
    November 15, 2010

    विशाल जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद। आपका कहना भी अपनी जगह सही है लेकिन यहां बात उस वर्ग की गयी है जिसे सामाजिक परंपराओं व मर्यादाओं के बीच रहते हुए अपना जीवनयापन करना है। आवश्यकता और सुविधा में अंतर है। मैं मानता हूं कि सुविधाभोगी वर्ग भी इस महंगाई के युग में परेशान है। समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसका वेतन आठ हजार रुपये भी नहीं है। यह भी सत्य है कि आमदनी के हिसाब से खर्च भी बढ़ते हैं। जिंदगी इसी का नाम है, इसी हिसाब-किताब में उम्र निकल जाती है।

    sharad malhotra के द्वारा
    January 6, 2011

    मनोज रस्तोगी जी ,मै आपकी बात से सहमत हूँ

    dr manoj rastogy के द्वारा
    January 6, 2011

    dhanyvad shardji

Himanshu के द्वारा
November 12, 2010

मनोज जी, सही लिखा है आपने। उधार के सहारे ही कटती है.                                              हिमांशु बंसल   

    dr.manojrastogi के द्वारा
    November 12, 2010

    हिमांशु जी आपका बहुत -बहुत आभार।

YOGENDRA VERMA VYOM के द्वारा
November 12, 2010

Dr. Manoj Rastogi ki rachnadharmita bhu ayami hai. Hazar Hazar Ke Aath Note main aapne madhyamvargiy parivar ke sanghaesh ki kaduvahat ko bahut hi bariki ke saath ukera hai. utkrisht rachna ke liye aapko anekanek badhaiyan. – Yogendra Verma Vyom

    dr.manojrastogi के द्वारा
    November 12, 2010

    दुषयंत कुमार का शेर है- यहाँ मासूम सपने जी नहीं पाते, इंहें कुंकुम लगाकर फेंक दो तुम भी।            आपको रचना पसंद आयी,आभारी हूँ।

Manoj के द्वारा
November 12, 2010

महोदय इस छोटे से लेख में न जाने कितनी बाते आपने समा दी. एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार की यह सबसे बडी समस्या होती है उसके पास पैसा आता कमहै और खर्च ज्यदा होता है,,लेकिन कहते है न संसार इसे ही कहते है कोई अपनी जिंदगी में मर के जीता है तो किसी को इतना मिलता है कि वह उसका गलत उपयोग करता है. प्रकृति का यह नियम ही अनोखा है…

    dr.manojrastogi के द्वारा
    November 12, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया पर मुझे भरत बेचैन की कविता याद आगयी -  गली-गली मजदूर मर रहे। अफसर,नेता देश चर रहे। अपने खून पसीने से-ये, साहूकार गोदाम भर रहे।

    dharmendra trivedi के द्वारा
    November 13, 2010

    मध्यम वर्गीय परिवार की यह सबसे बडी समस्या होती है मनोज जी, सही लिखा है आपने। हार्दिक बधाई…………….

    dr manoj rastogi के द्वारा
    November 18, 2010

    धर्मेंद्र जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद


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